खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 550, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रसङ्गात् । प्रतीतिरेव नैवमिति चेन्न । भेदाभेदप्रतीतीनां शाब्दस्वाप्नादि- प्रतीतीनां च तादृशां सम्भवात् । समुच्चयप्रकाशे कोट्योरविरोधः प्रकाशते, संशये तु विरोध इति चेन्न । 'पीतः शङ्खः' इत्यादिषु पीतत्वशङ्खत्वादेर्भिन्नाश्रयतानियमं विरोधं जानतोऽपि प्रत्ययात् । तथापि तस्यां बुद्धौ न भासते विरोध इति चेन्न । कथमेवमिति प्रकाशेऽपि तत्प्रकाशात् । तयोरेकाश्रययोर्विरोधप्रतीतेरवश्योपेयत्वात् । मिथ्याधियस्ता इति चेन्न । संशयस्यापि भवद्भिरतत्त्वबुद्धितयाऽङ्गीकारात् । तत्त्वातत्त्वबुद्धयोश्च तद्विषयत्वेन विशेषाभावात् । नहि मिथ्यारजतबुद्धौ रजतबुद्धिरेव न भवति । अव्यवस्थितकोटिद्वयविषयः संशय इति चेत्; केयमव्यवस्थितता ? धर्मी में उभयकोटियों के अवगाही निश्चय में संशय-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। 'एकधर्मी में विरुद्ध कोटिद्वय का अवगाही निश्चय होता ही नहीं' ऐसा नहीं कह सकते, कारण भेदाभेदवादी के मत में 'भिन्न और अभिन्न यह घट है' यह प्रतीति तथा शब्द से स्वप्न में भी ऐसी प्रतीति होती है। 'निश्चय में दोनों कोटियों का विरुद्धत्व नहीं भासता और संशय में वह भासता है—यही दोनों में भेद है' ऐसा भी नहीं कह सकते । कारण पीतत्व और शङ्खत्व के भिन्नाश्रयत्वरूप विरोध को जो जानता है, उसे भी पित्तरोग-काल में 'पीत शङ्खः' ऐसी प्रतीति होती ही है। समर्थन—यद्यपि पीतत्व और शंखत्व विरुद्ध हैं, तथापि उक्त निश्चय में विरोध नहीं भासता । खंडन—'पीतः शंखः कथम्' ऐसी विरोधविषयक प्रतीति भी होती है, कारण पीतत्व और शंखत्व की एकाधिकरण में प्रतीति निश्चय ही विरोधविषयक माननी होगी । समर्थन—'पीतः शंखः' यह प्रतीति भ्रम है, अतः अतिव्याप्ति नहीं । कारण संशय के लक्षण में 'यथार्थत्वे सति' यह भी निवेश है। खण्डन—यदि संशय के लक्षण में 'यथार्थत्वे सति' निवेश करें, तो संशय के अयथार्थ होने से असम्भव हो जायगा। किञ्च—तत्त्वबुद्धि और अतत्त्वबुद्धि दोनों के विरुद्धकोटिद्वयावगाही होने से संशयत्व में कोई विशेष नहीं है, कारण मिथ्या रजत-बुद्धि भी रजतबुद्धि ही है । अर्थात् जहाँ शुक्ति में 'रङ्गं रजतं वा' ऐसा संशय होता है, वहाँ अव्याप्ति के भय से संशय के लक्षण में 'यथार्थत्वे सति' यह निवेश नहीं कर सकते । समर्थन—'अव्यवस्थित जो कोटिद्वय, वह जिसका विषय हो, वह संशय है', ऐसा लक्षण करेंगे। खंडन—'अव्यवस्थितता' क्या वस्तु है ? यदि आप कहें, अव्यवस्थितता