खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 551, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] संशय-लक्षण का खण्डन ५२६ पाक्षिकतेति चेत्; न पर्यायं पृच्छामः, अपितु किं कोटिद्वयस्वरूपमेव उत कोटिद्वयस्य धर्मः कश्चित् ? आद्ये कोटिद्वयनिश्चयेन सहाविशेषस्तदवस्थः। द्वितीये यद्यसौ केनचित्प्रमाणेन सिद्धस्तदा तस्यैव कोटिद्वयाश्रिततद्धर्मविषयस्य संशयत्वप्रसङ्गेन प्रमाणत्वव्याघातः। अथ कस्यचित्प्रमाणस्य नासौ विषयः; नास्ति तर्हि विषयकृतो विशेषः । एतेन—अन्योऽपि यः कश्चिद्विषयविशेषः स्थाणुतदभाव-पुरुषतदभावादिरूपो- ऽभिधीयते, सोऽपि निरस्तो वेदितव्यः । अत्यन्तासत एव च तस्य प्रतिभासे जितं जिनैरसत्ख्यातिवादिभिः । क्वचित्सतश्चेत्तत्रैव प्रसङ्गः । नापि द्वितीयः ; कारणविशेषो हि विशिष्य सामग्री स्यात्तदेकदेशो वा ? पाक्षिकता है, तो यह पर्याय-कथन हुआ । हम तो पर्याय नहीं पूछते, किन्तु पाक्षिकता कोटिद्वय का स्वरूप है या कोटिद्वय का धर्म ? यह पूछते हैं । प्रथम पक्ष में ‘पीतः शङ्खः’ इस कोटिद्वय के निश्चय में अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । द्वितीय पक्ष में यदि वह पाक्षिकता किसी प्रमाण से सिद्ध है, तो वह प्रमाण कोटि- द्वय में आश्रित पाक्षिकता-विषयक होने से संशय हुआ । फिर वह प्रमाण कैसे हो सकता है ? यदि पाक्षिकता किसी प्रमाण से सिद्ध नहीं है, तो विषयकृत संशय में कुछ विशेषता सिद्ध नहीं हुई । ‘स्थाणुत्व, पुरुषत्व आदि जो संदेह के विषय हैं, तद्-रूप या तन्निष्ठ कोई अतिशय अनुभवसिद्ध है और तद्विषयक ज्ञान संशय है’ यह कथन भी उक्त युक्ति से खण्डित है । अर्थात् यदि वह अतिशय प्रमाणसिद्ध है, तो प्रमाणत्व का व्याघात है । यदि प्रमाण से असिद्ध है, तो प्रमाण के अभाव से अतिशय ही असिद्ध है । यदि कहें कि संशय में अत्यन्त असत् ही अतिशयरूप भासता है, तो असत् का स्वीकार होने से आपके लिए अपसिद्धान्त हुआ और शून्यवादी बौद्ध विजयी हुए । यदि कहें कि वह क्वचित् सत् है, तो जिस प्रमाण से वह सिद्ध हुआ, उसी प्रमाण में उस संशय-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । ‘'संशय में कारणकृत विशेष है' यह द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है; क्योंकि वह कारणविशेष सामग्री है या सामग्री का एकदेश ? ६७