भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

पृष्ठ 552, कुल 610 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 552

५१० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ नाद्यः; तस्या अप्रत्यक्षत्वेन तदुपहितस्य प्रत्यक्षतोऽवगमानुपपत्तेः। न च तस्या अनुमेयत्वम्; लिङ्गासम्भवात्। कार्यविशेष एव लिङ्गमिति चेन्न । कार्यगतस्यैव विशेषस्य चिन्त्यमानस्याद्याप्यप्राप्तेः जातिभेदस्य दूषणीयत्वात्। नापि द्वितीयः ; दृश्यस्य तदेकदेशस्य साधारणधर्मदर्शनादेर्विशेषद्वयस्मरणा- देश्च साधारणधर्मविशेषद्वयज्ञानप्रत्यक्षादावपि हेतुत्वेन साधारणत्वात् । अदृश्ये च तस्मिँल्लिङ्गाभावात् । तेन कार्ये विशेषजात्याधानस्य निरस्यत्वात्। तस्या अविषयत्वेन अनुव्यवसायसाक्षिककार्यगतविशेषीभवनासामर्थ्यात् । नापि तृतीयः ; तस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् । यदि सामग्री कहें, तो सामग्री का प्रत्यक्ष न होने से उक्त लक्षणयुक्त संशय का भी प्रत्यक्ष नहीं होगा। लिङ्ग के न होने से वह सामग्री अनुमेय भी नहीं है। समर्थन—कार्य-विशेष ( संशय ) ही लिङ्ग है। खंडन—संशयगत विशेष का ही तो विचार हो रहा है और अबतक कुछ भी निश्चित नहीं हुआ है। 'संशयत्व जाति है' इस पक्ष का तो आगे खण्डन करेंगे । 'सामग्री के एकदेश से संशय में विशेष है' यह द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है; क्योंकि संशय का दृश्य कारण साधारणधर्म का दर्शन या विशेषद्वय का स्मरण है। वे दोनों स्वप्रत्यक्ष ( अपने अनुव्यवसाय ) के भी कारण हैं। अतः यदि वे संशयत्व-व्यवहार के कारण हों, तो उनके अनुव्यवसाय में भी संशयत्व-व्यवहार होने लगेगा। यदि अदृश्य सामग्री के एकदेश को विशेष मानें, तो उसमें कोई प्रमाण नहीं है। यदि संशयत्व जाति को लिङ्ग कहें तो उसका ( संशयत्व जाति का ) आगे निरास करने- वाले ही हैं। यदि कहें कि 'संदेह्मि' इत्याकारक प्रत्यक्ष ? अनुभवसिद्ध संशयत्व जाति का आगे आप के द्वारा निरास करने पर भी संशय में कोई अन्य अतीन्द्रिय कारणवृत्ति उपाधि मान लेंगे, तो वह भी ठीक नहीं। कारण वह उपाधि प्रत्यक्ष की अविषय होनेसे अनुव्यवसायसाक्षिक 'मम संशयो जातः' इत्याकारक जो संशयज्ञानात्मक कार्य है, उसका विशेष होने की सामर्थ्य ही उसमें नहीं है। अथवा प्रत्यक्षात्मक अनुव्यवसाय उक्त अतीन्द्रिय कारणाधेया उपाधि में प्रमाण न होने से अन्य कोई प्रमाण कहना होगा । वह अशक्य होने से ऐसी उपाधि मान नहीं सकते । 'विषय या कारण से अन्य किसी सम्बन्धिकृत संशय में विशेष है' यह तृतीय पक्ष भी ठीक नहीं है; कारण उसे दिखा नहीं सकते ।