खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५११
वैयधिकरण्येऽप्युपपाद्यसम्बन्धश्चेदनियमः, सम्बन्धश्चेदविश्रान्तिरिति । एतेन शक्तिः कारणत्वमित्यपि निरस्तम् । किञ्च—प्रत्यक्षप्रमितौ विषयस्यापि सन्निकर्षव्यापारकस्य कारणतया स्ववृत्त्यापत्तेः । अन्यथाऽक्षस्यापि तत्र कारणत्वं न स्यात्, अनुविधानाविशेषात् । विषयाविशेषितात्सन्निकर्षस्य तथात्वेऽत्यापत्तेः, क्वचित् कारणत्वाकारणत्व- विवादस्य चानुच्छेद्यत्वापत्तेः । किञ्च—उपपाद्य और उपपादक का परस्पर सम्बन्ध है या नहीं ? यदि नहीं, तो 'इस उपपादक से इस उपपाद्य की कल्पना होती है' यह नियम नहीं होगा । यदि सम्बन्ध है, तो उस सम्बन्ध का भी अन्य सम्बन्ध एवं उत्तरोत्तर सम्बन्ध की कल्पना में अन- वस्था हो जायगी । 'कारण में वृत्ति शक्तिविशेष कारणत्व है' यह मीमांसक का मत भी ठीक नहीं है; कारण पूर्वोक्त रीति से उसका प्रत्यक्ष आदि न होने से उसकी सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है । अर्थात् शक्ति अतीन्द्रिय होने से प्रत्यक्ष नहीं है, अर्थापत्ति से ही उसकी सिद्धि करनी होगी और पूर्वोक्त दोषों से अर्थापत्ति भी उसमें प्रमाण नहीं हो सकती, यह भाव है । किञ्च—प्रत्यक्ष-प्रमा में विषय भी कारण होने से कारणत्व-प्रत्यक्ष में कारणत्व भी विषयरूप से कारण हुआ । एवञ्च कारणत्व में वही कारणत्व मानें, तो स्व में स्ववृत्तित्व होने से आत्माश्रय हो जायगा । यदि अन्य कारणत्व मानें, तो वह अननुगत हो जायगा, परस्पर अध्याप्ति और अनवस्था भी होगी । यदि विषय के साथ प्रत्यक्ष का अन्वय-व्यतिरेक होते हुए भी उसे प्रत्यक्ष में कारण न मान केवल सन्निकर्ष के प्रति ही कारण मानें, तो इन्द्रियाँ भी प्रत्यक्ष में कारण न होंगी; क्योंकि विषय और इन्द्रिय दोनों का अन्वय-व्यतिरेक प्रत्यक्ष में तुल्य है । यदि विषय से अविशेषित सन्निकर्ष को कारण मानें, तो अन्य विषय के साथ सन्निकर्ष होने पर अन्य विषय का प्रत्यक्ष हो जायगा । किञ्च—यदि कारणत्व प्रत्यक्ष है, तो अभाव-प्रत्यक्ष में इन्द्रियसन्निकर्ष की कारणता के विषय में नैयायिक और मीमांसक का जो विवाद होता है, वह न होना चाहिए; क्योंकि प्रत्यक्ष में विवाद ही नहीं होता । यदि प्रत्यक्ष में भी विवाद हो, तो उसका कदापि उच्छेद ही न होना चाहिए ।