खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 534, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें५१२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ ] एकेन तस्य दृष्टेरपरेण चादृष्टेः । तल्लक्षणस्य नियतपूर्वभावित्वादेः कथनेन कथितदोषापत्तेः । विना च तच्चिह्नाद् भ्रमसन्देहौ तत्र किं दर्शनादुच्छेद्यौ, अक्षेण हेतुत्व- धर्मिणि दृष्टेऽपि तददृष्ट्या यदवगमोऽक्षसहकारी वाच्यः, तदर्थेन सिद्धेन हेतु- धियोऽर्थवत्त्वे सम्भवति तदन्यार्थकल्पनागौरवं कुतो बलात् सिद्ध्येत् । तस्यान्वयानुविधानादेरनुमेयहेतुत्वे व्योमादावनुपपत्तेस्तदन्यत्वसिद्धिरिति समर्थन—नैयायिक के मत में अभाव-प्रत्यक्ष में सन्निकर्ष की कारणता प्रत्यक्ष है, पर मीमांसक को स्वमत में आग्रहरूप दोष प्रतिबन्धक होने से उसका प्रत्यक्ष नहीं होता, इसीलिए विवाद होता है । फिर जब नियतपूर्ववर्तित्वरूप हेतु से नैयायिक मीमांसकों के कारणत्व का अनुमान कराता है, तो विवाद का उच्छेद हो जाता है, अतः विवाद अनुच्छेद्य नहीं है । खण्डन—पूर्ववर्तित्व आदि लक्षण पूर्वोक्त दोषों से खण्डित हैं, अतः इनसे कारणता का अनुमान संभव न होने से उक्त विवाद का उच्छेद ही न होना चाहिए । किञ्च—कभी-कभी 'इदं कारणं न वा' ऐसा संदेह या अकारण में 'इदं कारणम्' ऐसा भ्रम हो जाता है । यदि कारण का लक्षण न हो, तो किसके दर्शन से उक्त संदेह या भ्रम की निवृत्ति होगी ? इसी तरह कभी-कभी कारण का प्रत्यक्ष होने पर भी कारणता का प्रत्यक्ष नहीं होता । अतः कारणता के प्रत्यक्ष में इन्द्रिय का कोई सहकारी अवश्य मानना होगा । एवञ्च यदि उसी सहकारी से कारणत्वविशिष्ट बुद्धि का निर्वाह हो जाता है, तो उससे अन्य कारणता की कल्पना का गौरव क्यों स्वीकार करें ? समर्थन—दण्डादि में कारणता अन्वय-व्यतिरेक के अनुविधानरूप हेतु से अनुमेय है और गगन आदि में व्यतिरेक न होने से धर्मिग्राहक प्रमाण [ अनुमानादि ] से ही ग्राह्य है । अतः एक अनुगत सहकारी न होने से अतिरिक्त कारणता मानते हैं । खण्डन—'दण्डः घटकारणम्' इस प्रत्यक्ष का विषय 'लक्षण से भिन्न कारणत्व धर्म है' यह सिद्ध होने पर उसे दृष्टान्त मानकर गगन आदि में अतिरिक्त कारणता का अनुमान हो और गगनादि में अन्वय-व्यतिरेक का अनुविधानरूप कारणता का बाध होने पर अतिरिक्त कारणता का अनुमान होने पर अनेकरूप कारणत्व न मानना पड़े,