खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 535, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५१३ चेन्न । अन्योन्याश्रयापत्तेः । प्रत्यक्षस्यान्यस्मिन्विषये सिद्धेऽन्यत्र दृष्टान्तेन तदनुमाम्, तत्सिद्धौ च प्रत्यक्षस्यान्यविषयतासिद्धिः । तस्य चानागन्तुकत्वे प्रागपि तत्सत्त्वादस्तीतिमतिवत् करोतीति प्रमापातः । आगन्तुकत्वे च तदुत्पत्तेः प्राक् कारणत्वं क्वापि न स्यात् । तथाप्यजातत्वे घटाद्यपि किं न तथा स्यात् । व्यावृत्तेषु तेष्वनुगतौ च सर्वं प्रति सर्वकारणत्वापातात् । प्रतिकार्यव्यक्ति तत् पृथगिति चेन्न । साधारणस्यापि तद्गतस्य स्वरूपस्य घटादिकारणतामतयाऽनुवृत्तौ घटकारणत्वस्यापि तन्तुकारणत्वापत्तेः । कारणत्वमात्रेण तदनुगतं रूपं न घटकारणत्वादिनेति चेन्न । घटादि- इसलिए 'दण्डः घटकारणम्' इस प्रत्यक्ष का विषय अतिरिक्त कारणत्व है—यह सिद्ध हो, इस प्रकार अन्योन्याश्रय हो जायगा । किञ्च—कारणत्व नित्य है या अनित्य ? प्रथम पक्ष में घट की उत्पत्ति से पूर्वकाल में भी कारणत्व रहने से पूर्वकाल में 'दण्डोऽस्ति' इस व्यवहार के तुल्य 'दण्डः करोति' यह व्यवहार भी हो जायगा । द्वितीय पक्ष में कारणत्व की उत्पत्ति से प्राक् कारणत्व-व्यवहार कहीं भी न होना चाहिए । एवञ्च कारणत्व का कोई उत्पादक न होने से उसकी उत्पत्ति ही नहीं होगी । यदि अनित्य होते हुए भी कारणत्व को अजात मानें, तो घट-आदि को भी अजात क्यों न मानें ? किञ्च—यदि स्वरूप से भिन्नरूप दण्ड, वेमा आदि कारणों में अनुगत एक कारणत्व मानें, तो सब कारणों से सब कार्यों की उत्पत्ति होनी चाहिए । कारण दण्ड में जो कारणता है, वह सब कार्यों के प्रति एक-सी है । जैसे गौ सबके प्रति 'गौ' है, किसीके प्रति 'अगौ' नहीं है । समर्थन—तत्तत् कार्य के भिन्न-भिन्न जो कारण, उनमें कारणत्व भिन्न-भिन्न है । अतः सबसे सबकी उत्पत्ति नहीं होती । खण्डन—यदि 'इदं कारणम्, इदं कारणम्' इस अनुगत प्रतीति से सिद्ध कारणत्व घटादि कारणस्वरूप ही है, तब घट का कारण तन्तु का कारण क्यों न हो ? : समर्थन—कारण में कारणत्वरूप सामान्य धर्म रहता है और घटादि में तत्तत् कार्यत्व से निरूपित तत्तत्कारणमात्रवृत्ति तत्तत्कारणत्वरूप विशेष धर्म रहता है । इस प्रकार उसमें दो धर्म रहते हैं । अतः दण्ड में सामान्य कारणत्व रहने पर भी , ६५