खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५१४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ विशेषानुपहितकारणत्वमात्रस्य किंप्रतीत्यनिर्देश्यस्य सद्भावे प्रमाणाभावात् । अन्यथा यदि किञ्चित्प्रति कारणे सामान्यतः कारणत्वं नाम धर्मः स्यात्, तदा तस्या एव व्यक्तेः किञ्चित्प्रत्यकारणत्वादकारणत्वमपि रूपं तत्र स्यादिति अनपेक्षितविशेषकारणत्वाध्यासाद् भेदेनेकमात्रमेवोच्छिद्येत । किञ्च—कार्यव्यक्तेः कारणमस्ति न वा ? न चेन्नित्यसत्त्वासत्त्वयोरन्यतर- प्रसङ्गः । अस्ति चेत् किं तत् कारणम् ? व्यक्तिविशेष इति चेन्न । पूर्वभावस्य रासभादिसाधारणत्वात् तां कार्यव्यक्तिं प्रति तस्याः किं तत्कारणत्वम् । स्वरूपमेवेति चेन्न । तस्य व्यावृत्तत्वात् । तस्यास्तत्कारणात्मत्वे चातदात्मनां तत्कारणत्वविरोधात्, तत्कारणत्वस्य च समवाय्यसमवायिनिमित्तभूतानेकव्यक्ति- पटादिनिरूपित विशेष कारणत्व न होने से दण्ड से पट की उत्पत्ति नहीं होती । खण्डन—कार्यविशेष के कारणविशेष में ही अन्वय-व्यतिरेक हैं, अतः अन्वय-व्यतिरेक से घटादि-कारणत्वविशेष ही सिद्ध होते हैं। उससे अतिरिक्त कारणत्व-सामान्य में कोई प्रमाण नहीं है । अर्थात् ‘घटकारणम्, पटकारणम्’ ऐसी ही प्रतीति होती है, ‘कारणम्, कारणम्’ ऐसी कार्यविशेष से अनालिङ्गित प्रतीति नहीं होती; अतः उसकी सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है । अन्यथा यदि कारण में कारणत्वरूप सामान्य धर्म मानें, तो वही कारण व्यक्ति किसीका अकारण भी होने से वहाँ अकारणत्वरूप सामान्य धर्म भी मानना पड़ेगा । इस तरह यदि अकारणत्वरूप सामान्य को भी मानें, तो विशेष की अपेक्षा से रहित उक्त कारणत्व और अकारणत्व परस्पर विरुद्ध हैं । एवञ्च परस्पर विरुद्ध दो धर्मों का अध्यास भेद का जनक होने से कहीं भी एक कारण सिद्ध न होगा । किंच—कार्यव्यक्ति का कारण है या नहीं ? यदि नहीं, तो कार्य का सर्वदा सत्त्व या सर्वदा असत्त्व होना चाहिए । यदि है, तो वह कारण क्या है ? व्यक्तिविशेष कारण है, यह तो कह नहीं सकते ; क्योंकि पूर्ववर्तित्वरूप कारणत्व अकारण रासभ में भी है । फिर उस कार्यव्यक्ति का उसमें कारणत्व क्या है, जो कारणमात्र में ही रहता है और रासभादि में अतिव्यास नहीं होता । समर्थन—कारण का स्वरूप ही कारणत्व है । रासभ के कारण न होने से उसका स्वरूप कारणत्व नहीं है । खण्डन—स्वरूप प्रतिव्यक्ति भिन्न-भिन्न होता है । अतः यदि दण्ड के स्वरूप को कारणत्व मानें, तो चक्र का स्वरूप कारण न होगा । एक कार्य का एक ही कारण होता है, ऐसा नहीं कह सकते; क्योंकि एक कार्य के समवायी,