भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 537

परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५१५ साधारणत्वात् । अनेकस्य चैकानुगतव्यवहारबुद्धिनिदानत्वे गोत्वाद्युच्छेदप्रसङ्गस्य दर्शितत्वात् । नियतपूर्वभावित्वमिति चेन्न । व्याप्त्यर्थस्य नियमस्यैकस्य सर्वत्र व्यक्ताव- सम्भवात्, पूर्वमात्रस्य चातिप्रसञ्जकत्वात् । तज्जातीयं प्रति नियततज्जातीय- त्वमिति चेन्न । तस्य तज्जातीयव्यक्त्यन्तरसाधारणत्वात् । नियततज्जातीयत्वे सति तत्पूर्वत्वमिति चेन्न । तत्समानकालोत्पत्तिककार्य- व्यक्तिशतजनकव्यक्तिशतसाधारणत्वात् । तथाऽभ्युपगमे चैकसमवाय्यादिनाशे सर्वतत्कार्यनाशप्रसङ्गः । असमवायी और निमित्त भेद से अनेक कारण होते हैं। किञ्च—यदि कारण के स्वरूप को ही कारणत्व मानें, तो स्वरूप के प्रतिव्यक्ति व्यावृत्त होने से कारणमात्र में एक अनुगत धर्म न होने से अनुगत प्रतीति या व्यवहार नहीं होगा । यदि भिन्न-भिन्न व्यक्तियों में अनुगत, एक कारणत्व न होने पर भी अनुगत प्रतीति या व्यवहार मान लें, तो कारण के तुल्य भिन्न-भिन्न गोव्यक्तियों में अनुगत गोत्व-जाति के बिना भी अनुगत-बुद्धि या व्यवहार हो जाने से गोत्वादि जातियों का ही उच्छेद हो जायगा । समर्थन —'नियम से पूर्वभावी कारण है' यही लक्षण करेंगे । वह सबमें अनुगत है और रासभादि में अतिव्याप्त भी नहीं है । खण्डन—'नियम' शब्द का अर्थ व्याप्ति है और वह व्याप्ति सभी कारण व्यक्तियों में एक नहीं हो सकती । अर्थात् घट-सामान्य की दण्डसामान्य में ही व्याप्ति होती है। यदि नियम का निवेश न कर पूर्वभावित्वमात्र लक्षण करें, तो रासभ में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'तज्जातीय के प्रति नियम से पूर्ववर्त्तिजातीयत्व कारणत्व है ।' घटत्वा- वच्छिन्न कार्य के प्रति दण्डादि की नियतपूर्ववर्तिता सुग्राह्य ही है । खण्डन—एक घटव्यक्ति का जो कारण, वह तज्जातीय अन्य घट व्यक्ति का भी कारण हो जायगा । समर्थन—'नियत तज्जातीयत्व से विशिष्ट तत्पूर्वत्व कारणत्व है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—जिस काल में एक घटकार्य उत्पन्न होता है, उसी काल में अनेक घटकार्य देश- भेद से उत्पन्न होते हैं। अतः एक घट से नियत पूर्ववर्त्तिजातीयत्व और तद्घट- पूर्वत्व अन्य घट के कारण में भी होने से पूर्ववत् अतिव्याप्ति हो जायगी। यदि एक घट के कारण को घटमात्र का कारण मान लें, तो एक घट के समवायी या असमवायी कारण का नाश हो जाने पर घटमात्र का नाश हो जायगा । कारण नैयायिक समवायी या असमवायी कारण के नाश से कार्य का नाश मानते हैं ।