भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 538

५१६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ तत्कालतज्जातीयसर्वसामग्रीतः सर्वतत्कालतज्जातीयोत्पत्तौ सामग्रीभेदस्य कार्यभेदहेतुतया प्रत्येकमिलितसामग्रीत्वविकल्पेन कार्यव्यक्त्यभेदप्रतिव्यक्ति- स्वरूपभेदयोरन्यतरप्रसङ्गश्च । समवायित्वं प्रत्यपि साधर्म्यानुविधायिनि नियमेऽत्यापत्तेः । व्यावृत्तत्वे चानियमात् । नियततज्जातीयत्वे सति तत्सादेश्यमिति चेन्न । समवायिदेशापेक्षया कार्य- किञ्च—यदि समानकालिक और समानजातीय सब सामग्रियों से समानकालिक सजातीय सब कार्यों की उत्पत्ति मानें, तो सामग्री-भेद ही कार्यभेद का हेतु होने से अब सामग्रीभेद नहीं रहा । अतः यदि सामग्री-समुदाय को सब कार्यों का जनक मानें, तो सब कार्यों का ऐक्य हो जायगा । यदि एक-एक सामग्री को सब कार्यों का जनक मानें, तो एक-एक कार्य भिन्नरूप हो जायगा । समवायिकारण-स्थल में भी यदि तन्तुत्वरूप से तन्तु को पट का समवायी कारण मानें, तो सब पटों में सब तन्तु समवायी कारण हो जायँगे । एवञ्च किञ्चित् तन्तु का नाश होने पर सभी पटों का नाश होने लगेगा । यदि तत्पट में तत्तन्तु को कारण मानें, तो कारणत्व का ज्ञान नहीं होगा, क्योंकि कारणत्व के शरीर में नियम ( व्याप्ति ) का प्रवेश है और सामान्य का ही सामान्य में नियम-ग्रह होता है । अतः तत्-तन्तु में व्याप्तिज्ञान न होने से कारणत्व का ज्ञान ही नहीं होगा । समर्थन—'तत्-पट के समान देश में विद्यमान तन्तु तत्-पट में समवायी कारण है' ऐसा कहेंगे । एवञ्च तन्तुमात्र पट में कारण नहीं होगा । खण्डन—तन्तु संयोग सम्बन्ध से भूतल में है और पट समवाय से तन्तु में । अतः दोनों एकदेश में न होने से सादेश्य न होने के कारण असम्भव हो जायगा । यदि कहें कि हम समवाय सम्बन्ध से अवयव-अवयवी का सादेश्य नहीं कहते, प्रत्युत संयोग सम्बन्ध से कहते हैं । एवञ्च संयोग से पट भी भूतल में है, तो तन्तु- पटस्थल में तो सादेश्य हो जायगा, तो यह भी ठीक नहीं। कारण रूप, रस आदि गुण संयोग से नहीं रहते, अतः गुणरूप कार्य के समवायी कारण-स्थल में अव्याप्ति हो जायगी । यदि कहें कि स्वाश्रय-संयोग सम्बन्ध से वह समवायी कारण के अधिकरण में है, १. अबतक सामान्यतः कारणत्वका खण्डन किया जा चुका। अब वैशेषिकाभिमत कारण- विशेष समवायिकारण का खण्डन करते हैं—'समवायित्वम्' इत्यादिसे ।