भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५१७ कारणयोः सादेश्यनियमानभ्युपगमात् संयोगिदेशापेक्षया गुणादावसम्भवात् । यथाकथञ्चित्सादेश्यमात्रस्य चातिप्रसञ्जकत्वात् । अदृष्टादेभिन्नदेशस्यापि कारणत्वोपगमे सर्वं प्रति सर्वकार्यसामग्र्याः कारण- त्वापातात्, पूर्वभावनियमादेस्तुल्यत्वात् । अनुगते च रूपेऽन्वयव्यतिरेकसम्भवात् व्यक्तिगतसामान्ययोरेव कार्य- कारणत्वापत्तेः । तद्गतसामान्ययोरेवान्वयव्यतिरेकादिनियमः, व्यक्त्योश्च कार्य- कारणतेति लक्ष्यलक्षणभाववैयधिकरण्यात् । सामान्याकारप्रविष्टां व्यक्तिमादायान्वयव्यतिरेके विशेषस्याकारणत्वं स्यात् , सामान्याकारेण च पूर्वसतः कार्यत्वम् । अतः अव्याप्ति नहीं, तो यथाकथंचित् (स्वसजातीय-संयोग सम्बन्ध से) तन्तुमात्र पटमात्र के अधिकरण में होने से तन्तुमात्र में समवायी कारणत्व की आपत्ति हो जायगी । किञ्च —अदृष्ट (धर्माधर्म) घटादि कार्यदेश से अन्यत्र (आत्मा में) रहकर भी कारण होता है । अतः कार्य-समानदेश ही कारण हो, यह नियम नहीं है । एवञ्च समानकाल में उत्पन्न कार्यमात्र में समानजातीय कारणमात्र की कारणता की आपत्ति हो जायगी, क्योंकि नियतपूर्ववर्तिता-जातीयता उभयत्र तुल्य है । किञ्च —दण्ड व्यक्ति और घट व्यक्ति में कार्यकारणभाव ही न होगा । कारण पूर्ववर्तिता-नियम सामान्यद्वय में ही विश्रान्त है । यदि कहें कि ‘निर्विशेषं न सामान्यम्’ इस न्याय से सामान्यावच्छेदेन भी व्यक्ति में ही कारणता पर्यवसित होती है, तो वह भी ठीक नहीं। कारण फिर भी सामान्यों का नियत पौर्वापर्य्यरूप कार्य-कारणभाव का लक्षण सामान्यों में ही रहेगा, दण्ड, घट आदि लक्ष्य में नहीं । एवञ्च लक्ष्य-लक्षण- भाव का वैयधिकरण्य हो जायगा । यदि कहें कि निर्विशेष सामान्य न होने से सामान्यनिष्ठ कार्यत्व-कारणत्व विशेष में भी रहता है, अतः लक्ष्य-लक्षणभाव में भी वैयधिकरण्य नहीं है, तो सामान्यविशिष्ट विशेष में कार्यत्व-कारणत्व और शुद्ध विशेष में लक्ष्यत्व होने से वैयधिकरण्य तद- वस्थ ही है। ‘सामान्य लक्ष्य भी है, अतः लक्ष्यलक्षणभाव का वैयधिकरण्य नहीं है’ यह भी नहीं कह सकते । कारण सामान्य नित्य होने से कार्य नहीं हो सकता । किंच सामान्य को कार्य मानें, तो उसके पहले से ही सिद्ध होने के कारण सत्कार्यवाद की आपत्ति आ जायगी, जो असत्कार्यवादी नैयायिकों के लिए अपसिद्धान्त हो जायगा ।