खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५१७ कारणयोः सादेश्यनियमानभ्युपगमात् संयोगिदेशापेक्षया गुणादावसम्भवात् । यथाकथञ्चित्सादेश्यमात्रस्य चातिप्रसञ्जकत्वात् । अदृष्टादेभिन्नदेशस्यापि कारणत्वोपगमे सर्वं प्रति सर्वकार्यसामग्र्याः कारण- त्वापातात्, पूर्वभावनियमादेस्तुल्यत्वात् । अनुगते च रूपेऽन्वयव्यतिरेकसम्भवात् व्यक्तिगतसामान्ययोरेव कार्य- कारणत्वापत्तेः । तद्गतसामान्ययोरेवान्वयव्यतिरेकादिनियमः, व्यक्त्योश्च कार्य- कारणतेति लक्ष्यलक्षणभाववैयधिकरण्यात् । सामान्याकारप्रविष्टां व्यक्तिमादायान्वयव्यतिरेके विशेषस्याकारणत्वं स्यात् , सामान्याकारेण च पूर्वसतः कार्यत्वम् । अतः अव्याप्ति नहीं, तो यथाकथंचित् (स्वसजातीय-संयोग सम्बन्ध से) तन्तुमात्र पटमात्र के अधिकरण में होने से तन्तुमात्र में समवायी कारणत्व की आपत्ति हो जायगी । किञ्च —अदृष्ट (धर्माधर्म) घटादि कार्यदेश से अन्यत्र (आत्मा में) रहकर भी कारण होता है । अतः कार्य-समानदेश ही कारण हो, यह नियम नहीं है । एवञ्च समानकाल में उत्पन्न कार्यमात्र में समानजातीय कारणमात्र की कारणता की आपत्ति हो जायगी, क्योंकि नियतपूर्ववर्तिता-जातीयता उभयत्र तुल्य है । किञ्च —दण्ड व्यक्ति और घट व्यक्ति में कार्यकारणभाव ही न होगा । कारण पूर्ववर्तिता-नियम सामान्यद्वय में ही विश्रान्त है । यदि कहें कि ‘निर्विशेषं न सामान्यम्’ इस न्याय से सामान्यावच्छेदेन भी व्यक्ति में ही कारणता पर्यवसित होती है, तो वह भी ठीक नहीं। कारण फिर भी सामान्यों का नियत पौर्वापर्य्यरूप कार्य-कारणभाव का लक्षण सामान्यों में ही रहेगा, दण्ड, घट आदि लक्ष्य में नहीं । एवञ्च लक्ष्य-लक्षण- भाव का वैयधिकरण्य हो जायगा । यदि कहें कि निर्विशेष सामान्य न होने से सामान्यनिष्ठ कार्यत्व-कारणत्व विशेष में भी रहता है, अतः लक्ष्य-लक्षणभाव में भी वैयधिकरण्य नहीं है, तो सामान्यविशिष्ट विशेष में कार्यत्व-कारणत्व और शुद्ध विशेष में लक्ष्यत्व होने से वैयधिकरण्य तद- वस्थ ही है। ‘सामान्य लक्ष्य भी है, अतः लक्ष्यलक्षणभाव का वैयधिकरण्य नहीं है’ यह भी नहीं कह सकते । कारण सामान्य नित्य होने से कार्य नहीं हो सकता । किंच सामान्य को कार्य मानें, तो उसके पहले से ही सिद्ध होने के कारण सत्कार्यवाद की आपत्ति आ जायगी, जो असत्कार्यवादी नैयायिकों के लिए अपसिद्धान्त हो जायगा ।
५१८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ द्रव्यसामग्र्या वृक्षसामग्र्या शिंशपासामग्र्या च पृथग्व्यक्तिजननापत्तेः, पृथगेव तासां सामग्रीत्वात् । सर्वासाम्च व्यक्तिं प्रत्येव जनकत्वात्, द्रव्यत्वा- दीनामजन्यत्वात् । शिंशपासामग्र्या वृक्षसामग्रीसहिताया एव सामग्रीभावान्न पृथक् शिंशपा- व्यक्तिरिति चेन्न । वृक्षसामग्र्याः शिंशपासामग्रीमतीत्यापि शालतमालादेर्वृक्षस्य जननात् पृथक्तया वृक्षव्यक्तिजननापत्तेः । साऽपि शिंशपासामग्री तन्मिलिता जनिकेति न व्यक्तिभेद इति चेन्न । शिंशपार्थातिरिक्तवृक्षार्थाभावापत्तेः । वृक्षशिंशपासामग्र्योरेकीभूयोर्जननाविशेषाद् वृक्षसामग्री च वृक्षजनन एव कथं क्वचिच्छिंशपासामग्री क्वचित्तमालसामग्रीमपेक्षत इति स्यात् । किञ्च—‘द्रव्यं वृक्षः शिंशपा च’ यह सामानाधिकरण्य प्रतीति अनुपपन्न हो जायगी; क्योंकि वृक्ष की सामग्री, द्रव्य की सामग्री और शिंशपा की सामग्री से भिन्न-भिन्न कार्य उत्पन्न नहीं होते । किन्तु वे होने चाहिए, कारण इनमें प्रत्येक में सामग्रीत्व रहता है । फिर द्रव्यत्वादि सामान्य अजन्य होने से ये तीनों सामग्रियाँ व्यक्ति की ही जनिका हैं । समर्थन — वृक्ष-सामग्री से युक्त ही शिंशपा-सामग्री में सामग्रीत्व है। अतः वृक्ष से पृथक् शिंशपा-व्यक्ति की उत्पत्ति नहीं होती, किन्तु वृक्षरूप शिंशपा की ही उत्पत्ति होती है । खंडन— ऐसा मानने पर वृक्ष से पृथक् शिंशपा की उत्पत्ति न हो, किन्तु वृक्ष-सामग्री तो शिंशपा-सामग्री की अपेक्षा करती ही नहीं। यदि वृक्ष-सामग्री भी शिंशपा-सामग्री की अपेक्षा करे, तो वृक्ष-सामग्री से ताल-तमाल की उत्पत्ति भी न होनी चाहिए । अतः शिंशपा-स्थल में शिंशपा से पृथक् वृक्ष की उत्पत्ति क्यों न हो ? समर्थन—वृक्ष-सामग्री भी शिंशपा-स्थल में शिंशपा-सामग्री से युक्त ही कार्य का जनन करती है । अतः शिंशपा से पृथक् वृक्ष की उत्पत्ति, नहीं होती । खंडन—यदि ऐसा मानें, तो शिंशपास्थल में शिंशपा से भिन्न ‘वृक्ष’ शब्द के अर्थ का अभाव हो जायगा । कारण सामग्री-भेद से कार्यभेद होता है । शिंशपास्थल में वृक्ष-सामग्री, शिंशपा-सामग्री दोनों एक होकर कार्यजनक हैं । फिर कार्यभेद कैसे होगा ? किंच—वृक्ष-सामग्री से वृक्ष की ही उत्पत्ति होती है, अन्य की नहीं । फिर वृक्ष की उत्पत्ति में ही उक्त सामग्री शिंशपा-सामग्री की और कहीं तालादि-सामग्री की अपेक्षा
परिच्छेद ] वर्तमानत्वादि-लक्षणों का खण्डन ५१६ एकस्य वृक्षलक्षणस्य कार्यस्य सामग्रीभेदे स्वरूपभेदापातात् । अननुगता- याश्च वृक्षसामग्रीत्वे पृथग्वृक्षव्यक्तेः पृथक्शिंशपाव्यक्तेरुत्पत्त्यापत्तेरित्यादि स्वयमूहनीयम् । वर्तमानत्वादि-लक्षण-खण्डनम् नियमे च प्राक्कालीनतयाऽभिधीयमाने प्रागित्यस्य व्यवच्छेद्यौ वर्तमान- भविष्यत्कालौ प्राक्कालश्च व्यवच्छेदको विवेचनीयः । न च तद्विवेचनं शक्यम् । वर्तमानादिबुद्धय एव स्वविषयवैचित्ये प्रमाणमिति चेन्न । तथाहि--वर्त- करती है, यह कैसे हो सकता है ? अन्यथा ( यदि अपेक्षा करे तो ) जैसे दण्डमात्र चक्र की अपेक्षा करने से सामग्री नहीं है, वैसे ही उक्त सामग्री भी अपेक्षा करनेमात्र से सामग्री न कहलायेगी । फिर, यदि एक ही शिंशपारूप वृक्ष की उत्पत्ति में वृक्ष-सामग्री, शिंशपा-सामग्री दोनों परस्पर निरपेक्ष समर्थ हों, तो एक ही कार्य का स्वरूप-भेद हो जाना चाहिए । कारण जब वृक्ष-सामग्री से पृथक् शिंशपा-सामग्री है, तब वृक्ष से पृथक् शिंशपा की उत्पत्ति की आपत्ति क्यों न हो ? इस प्रकार के खण्डन की स्वयं भी ऊहा कर लेनी चाहिए । वर्तमानत्वादि के लक्षणों का खण्डन किञ्च—'प्राक्कालवृत्तित्वरूप सम्बन्ध से जो कार्य का व्यापक हो, वह कारण है' इस लक्षण में प्रविष्ट व्यवच्छेदक ( इतरनिषेधक ) प्राक्काल तथा व्यवच्छेद्य ( निषेध्य ) वर्तमान और भविष्यत् काल के लक्षणों का भी विचार करना चाहिए । किन्तु इनके लक्षणों का निश्चय नहीं हो सकता । अतः कारणत्व अनिर्वचनीय है। समर्थन—वर्तमान काल, अतीत काल और भविष्यत् काल की बुद्धियाँ ही अपने- अपने विषय वर्तमान आदि कालों के भेद में प्रमाण हैं । संडन—यह युक्त नहीं, कारण जबतक इस बात का निश्चय न हो कि इन बुद्धियों के विषय क्या हैं, तब- तक इन बुद्धियों के प्रामाण्य का ग्रह ही नहीं होगा । अर्थात् विषय के यथार्थत्व के अधीन ही ज्ञान का प्रामाण्य है । अतः विषय के स्वरूप के ज्ञान के बिना ज्ञान में
५२० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ मानादिबुद्धेरेव को विषयः ? कालविशेष इति चेन्न । कालस्य विशेषः स्वाभाविक औपाधिको वा ? नाद्यः ; कालस्य भवद्भिरेकत्वाभ्युपगमात् , य एव कालो वर्तमानः प्रतीयते, स एव पूर्वं भावीति पश्चात् भूत इति च न प्रतीयेत । त्रिविधस्वभाव एवासाविति चेन्न । भेदप्रसङ्गात् , व्यवस्थानुपपत्तिप्रसङ्गाच्च । यदैव वर्तत इति प्रत्ययस्तदैव वृत्तो वर्तिष्यत इति प्रत्ययप्रसङ्गात् । द्वितीयश्चेदुपाधिरभिधीयताम् । सूर्यादिक्रियासम्बन्धभेदः स इति चेन्न । भूतभविष्यतोरपि क्रियासम्बन्धप्रत्ययस्यावश्यं वक्तव्यत्वात् । य एव दिवसः सूर्यगतिविशेषावच्छिन्नो वर्तत इति प्रतीतः, स एव हि तदवच्छिन्नो वृत्त इत्य- वगम्यते वर्त्स्यन्निति च । न हि निर्विशेषस्य कालस्य तदतीतत्वं प्रतीयतेऽनाग- तत्वं वा, किन्तु उपाधिविशेषेणैवावच्छिन्नस्य । येनैवासौ पूर्वं दिनान्तरात् प्रामाण्य का ज्ञान दुर्लभ होने से अन्योन्याश्रय है । यदि कहें कि कालविशेष वर्तमान है, तो काल का वह विशेष स्वाभाविक है या औपाधिक ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण काल को आप एक मानते हैं । अतः जो काल वर्तमानत्वरूप से प्रतीत होता है, वही पहले भविष्यत्त्वरूप से और पीछे भूतत्वरूप से प्रतीत नहीं होगा । एक ही काल का त्रिविध स्वभाव है, यह कथन भी युक्त नहीं । कारण स्वभाव के भेद से काल का भी भेद हो जायगा । यदि विरुद्ध धर्मत्रय को एक काल का स्वभाव मान लें, तब भी जिस काल में 'वर्तते' यह प्रतीति होती है, उसी काल में 'वृत्तः, वर्तिष्यते' ऐसी प्रतीति हो जायगी । कारण तीनों स्वभाव काल में रहते हैं, अतः सदा तीनों व्यवहार होने चाहिए । काल का विशेष औपाधिक है, यह द्वितीय पक्ष मानें, तो उपाधि क्या है, यह कहिये । यदि कहें कि सूर्यादि-क्रिया का सम्बन्ध उपाधि है, तो भूत-भविष्यत् में भी सूर्य-क्रिया के सम्बन्ध की प्रतीति अवश्य मानेंगे । कारण जिस सूर्य के गतिविशेष से युक्त जो दिवस 'वर्तते' इस प्रतीति का विषय है, वही उसी सूर्यक्रिया से युक्त 'वृत्तः, वर्तिष्यते' इस प्रतीति का भी विषय होता है । विशेष उपाधि से रहित काल में अतीतत्व, अनागतत्व की प्रतीति नहीं होती, किन्तु उपाधिविशेष ( सूर्यक्रिया ) से अवच्छिन्न में ही अतीतत्वादि की प्रतीति होती है । जिस उपाधि से अवच्छिन्न वह
[रिच्छेद ] वर्तमानत्वादि-लक्षणों का खण्डन ४२१ व्यवच्छिन्नो वर्तत इति प्रतीतः, तेनैवोपाधिना तत एव व्यवच्छिन्नो वृत्त इति वर्तिष्यत इति च कदाचित् ज्ञायते । ननु सत्यमेतत्, परं यदा तदुपाधिसम्बन्धस्तस्य स्वरूपेणावतिष्ठमान- स्तदा वर्तमानप्रत्ययः, यदा स एव विनष्टो भवति तदा भूतप्रत्ययः, यदाऽनागत- स्तदा भविष्यत्प्रत्यय इति । नैतदस्ति ; यद्यत्र लटो विवक्षितोऽर्थस्तदा तज्ज्ञानस्यैव तज्ज्ञानोपायत्वमिति आत्माश्रयानवस्थयोरन्यतरप्रसङ्गः । विनष्टादिशब्दाश्च अतीतादिपर्यायास्तेषां सर्वेषामेवार्थे निरूप्यमाणे , तन्मध्यपतितमेकं शब्दं प्रयुज्य तन्निर्वृक्तिं कुर्वाणः श्लाघनीयप्रज्ञो मातापितृमानसि । क्रियावच्छिन्नः कालो वर्तमानः, तत्प्रागभावावच्छिन्नो भूतः, तत्प्रध्वंसाव- दिवस पूर्वकाल में अन्य दिवसों से व्यवच्छिन्न होकर 'वर्तते' इस प्रतीति का विषय था, उसी उपाधि से उसी अन्य दिवस से व्यावृत्त वह दिवस किसी काल में 'वृत्तः, वर्तिष्यते' इन प्रतीतियों का भी विषय होता है। समर्थन—आपका यह कथन सत्य है, किन्तु जिस काल में उपाधि का उक्त सम्बन्ध स्वरूपतः वर्तमान है, उस काल में 'वर्तते' ऐसी प्रतीति होती है; जिस काल में वह उपाधि नष्ट हो जाती है, उस काल में 'भूतः' इत्याकारक प्रतीति होती है और जब वह उपाधि अनागत रहती है, तब 'भविष्यति' ऐसी प्रतीति होती है । खंडन—यह कथन भी अयुक्त ही है, कारण लक्षणघटक 'वर्तमान' शब्द का अर्थ वर्तमान काल ही है । अतः वर्तमान काल के लक्षण में वर्तमान काल घटक हुआ । वह लक्षणघटक वर्तमान यदि लक्ष्यभूभ वर्तमानरूप ही है, तो आत्माश्रय और यदि अन्य है, तो उसके लक्षण में अन्य वर्तमान घटक है, इस तरह अनवस्था हो जायगी । किञ्च—विनष्ट, अतीत आदि शब्दों का एक ही अर्थ है । अतः उन्हीं सब शब्दों के अर्थों के निरूपण के समय यदि आप विनष्टघटित अतीत का लक्षण करते हों, तो आपकी बुद्धि प्रशंसनीय है और आप माता-पिता आदि गुरुजनों से युक्त हैं। अर्थात् यदि लक्ष्य और लक्षणघटक 'अतीत', 'विनष्ट' शब्दों का अर्थ एक ही है, तो आत्माश्रय और यदि लक्षणघटक अतीत शब्द का अर्थ लक्ष्य से अन्य है, तो इस प्रकार उत्तरोत्तर निवेश से अनवस्था हो जायगी । समर्थन—पाकादि क्रिया से अवच्छिन्न काल वर्तमान है और क्रिया के प्रागभाव ६६
५२२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
च्छिन्नो भविष्यन्निति चेन्न । अतीतानागतप्रतीतिकालोऽपि क्रियावच्छिन्नः प्रतीयत इति वर्तमानप्रत्ययप्रसङ्गस्य तादवस्थ्यात्, क्रियानवच्छिन्नस्य तत्प्राग्- भावप्रध्वंसाभावावच्छेदानुपपत्तेः । प्रागभावश्च प्रागर्थानिरुक्तौ कथं न दुरधिगमः । प्रध्वंसस्यापि प्राग्- भावात्कथं विशेषो वक्तव्यः ? अभावो विनाशी प्रागभावः, उत्पत्तिमान् प्रध्वंस इत्यनयोर्विशेष इति चेन्न । को हि प्रागभावस्य विनाशो येन विनाशीत्युच्यते ? यदि प्रतियोगिभूतो घटादिः, प्रध्वंसस्यापि प्रागभाववत्प्रतियोगीति सोऽपि विनाशी प्राप्तः । उत्पत्तिमांश्च प्रध्वंस इत्युत्पत्तिपदार्थो विवेचनीयः । यद्यसौ असतः सत्त्वम्, से अवच्छिन्न काल भूत है और क्रिया के ध्वंसाभाव से अवच्छिन्न काल भविष्यत् है। खंडन—अतीत-अनागत की प्रतीतियों के काल में भी क्रिया से अवच्छिन्न ही काल प्रतीत होता है, अतः अतीत आदि की प्रतीति के काल में वर्तमान-प्रत्यय हो जायगा। कारण जो क्रिया से अनवच्छिन्न है, वह क्रिया के प्रागभाव या ध्वंसाभाव से अवच्छिन्न हो नहीं सकता । अर्थात् प्रतियोगी से अविशिष्ट नहीं, किन्तु प्रतियोगी से विशिष्ट ही प्रागभाव या ध्वंस की प्रतीति होती है। अतः ध्वंसादि से अवच्छिन्न काल ध्वंस के विशेषण क्रिया से अवश्य ही अवच्छिन्न रहेगा। कारण विशेषण के अवच्छिन्नत्व के बिना विशिष्ट से अवच्छिन्नत्व कहीं भी नहीं हो सकता। किञ्च—जबतक प्राक् शब्द के अर्थ का निर्वचन न हो, तबतक प्रागभाव शब्द का अर्थ भी दुर्ज्ञेय क्यों नहीं है और ध्वंसाभाव का प्रागभाव से भेद भी किस प्रकार होगा ? समर्थन--'विनाशी अभाव प्रागभाव है और उत्पत्ति से युक्त अभाव ध्वंसाभाव है' यही दोनों अभावों में भेद है। खण्डन—प्रागभाव का विनाश क्या वस्तु है जिससे वह 'विनाशी' कहा जाता है। यदि प्रतियोगीरूप घटादि को प्रागभाव का विनाश मानें, तो वही ध्वंस का भी विनाश है, अतः ध्वंस भी विनाशी हुआ । किञ्च—'उत्पत्तियुक्त अभाव ध्वंस है' यहाँ उत्पत्ति का भी विचार करना चाहिए कि वस्तुतः उत्पत्ति का क्या अर्थ है ? यदि कहें कि असत् का सत्त्व उत्पत्ति है और सत्त्व
परिच्छेद ] वर्तमानत्वादि-लक्षणों का खण्डन ५२३ तच्च सामान्यं तदाऽभावेऽसम्भव एव। अथ स्वरूपसत्त्वं तदा प्रागभावेऽपि प्रसङ्गः, तस्यापि कदाचिदसत्त्वात् । पूर्वमसतः पश्चात्सत्त्वं विवक्षितमिति चेन्न। पूर्वेदानींपश्चादर्थस्यैवा- निरूपणात् । एतेन कारणावच्छिन्नं सत्त्वमुत्पत्तिरित्यपि निरस्तम् । पूर्वापरनिर्वचनमन्त- रेण कारणार्थानिर्वचनात् । अस्तु तावदतीतानागतयोर्यथातथा निरुक्तिः । यत्क्रियावच्छिन्नो यः कालः स तत्क्रियापेक्षया वर्तमानो न त्वन्यापेक्षयेति चेत् ; तदपेक्ष्येति कोऽर्थः— किं तदुपधानेन, उत तदवधिकतया, उत तत्प्रतियोगिकतया, उत तेन प्रकारेणेत्येव ? नाद्यः; उपाध्यवच्छिन्नस्य अतीतानागतप्रतिपत्तिविषयत्वमपि तस्येत्य सकृदुक्तत्वात् । सत्ता जाति है, तो ध्वंसाभाव में सत्ता जाति न होने से असम्भव हो जायगा । यदि स्वरूप-सत्त्व है, तो प्रागभाव का भी कदाचित् कार्य की उत्पत्ति से पूर्व स्वरूपतः सत्त्व है ही । अतः प्रागभाव में ध्वंस के लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'पूर्वकाल में असत् का उत्तरकाल में जो स्वरूपसत्त्व है, वह उत्पत्ति है ।' खंडन—पूर्व, इदानीम्, और पश्चात् शब्दों के अर्थों का अद्यावधि निरूपण नहीं हुआ है । अर्थात् पूर्व (अतीत) के लक्षण में ध्वंसाभाव का, ध्वंसाभाव के लक्षण में उत्पत्ति का और उत्पत्ति के लक्षण में पूर्व का निवेश होने से चक्रक हो जायगा । समर्थन—कारण से अवच्छिन्न (कारण में समवेत) जिसका सत्त्व हो, वह उत्पत्ति है । प्रागभाव का सत्त्व कारण में समवेत नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—कारण के लक्षण में 'पूर्व' का निवेश होने से पूर्वत्व का निर्वचन न होने तक कारणत्व की निरुक्ति नहीं हो सकती । अतः उक्त युक्ति से चक्रक हो जायगा । समर्थन—अतीत और अनागत कालों के चाहे जो लक्षण करें, सम्प्रति वर्तमान काल का यह लक्षण करते हैं कि 'जिस पाकादि क्रिया से अवच्छिन्न जो काल हो, वह उस क्रिया की अपेक्षा वर्तमान है, अन्य क्रिया की अपेक्षा नहीं । खण्डन—इस लक्षण में 'अपेक्षा' शब्द का क्या अर्थ है, क्रिया की उपाधि रूप से, अवधि रूप से, प्रतियोगी रूप से या प्रकार मात्र से अपेक्षा है ? इनमें प्रथम कल्प युक्त नहीं, कारण उक्त रीति से अतीत-अनागत व्यवहार-काल
५२४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ चतुर्थ नापि द्वितीयः ; ‘अस्मादयं दीर्घः' इतिवत् ‘अस्मादयं वर्तते' इत्यवध्यपेक्षा- मन्तरेण प्रतीयमानत्वात् सर्वदैव च त्रिविधावध्यपेक्षया ‘आसीदस्ति भविष्यती'ति प्रत्ययाव्यवस्थाप्रसङ्गात् । अत एव न तृतीयः । नापि चतुर्थः; अतीतानागतप्रतीतिकाले क्रियावच्छेदप्रकारेण वर्तमानप्रत्यय- विषयत्वप्रसङ्गात् । नासौ क्रियावच्छेदलक्षणः प्रकारोऽतीतानागतकाले वर्तत इति चेन्न । वर्त- मानताया अद्याप्यनिरूपणेन वर्तत इत्युक्त्वा विशेषस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् । तत्क्रियाकाले तत्क्रियावच्छिन्नः कालो वर्तमान इति चेन्न । कालस्य काला- भी तत्क्रिया से अवच्छिन्न काल है । अतः उस क्रियारूप उपाधि की अपेक्षा उस काल में वर्तमानत्व हो जायगा, यह दोष हम बार-बार कह आये हैं । द्वितीय और तृतीय कल्प भी युक्त नहीं हैं। कारण जैसे ‘अस्मात् अयं दीर्घः' इत्यादि व्यवहार में नियमतः अवधि की अपेक्षा होती है या जैसे ‘घटात् भिन्नः पटः' इत्यादि व्यवहार में भेद प्रतियोगी की अपेक्षा करता है, वैसे ही ‘वर्तते’ इस व्यवहार में नियमतः ‘अस्मात्’ ऐसी अवधि या प्रतियोगी की अपेक्षा नहीं होती । अर्थात् ‘घटो वर्तते' ऐसा व्यवहार होता है, 'घटाद् वर्तते' ऐसा व्यवहार नहीं होता । यदि अवधि को प्रतियोगी की नियमतः अपेक्षा हो, तो 'घटाद् वर्तते' ऐसा व्यवहार भी होने लगेगा । ‘उसे क्रिया की अपेक्षा से' अर्थात् उस क्रियारूप प्रकार से, यह चतुर्थ कल्प भी अयुक्त है । कारण अतीत-अनागत व्यवहार में भी ध्वंसादि के विशेषणत्वरूप से उस क्रिया का अवच्छेद काल में है । अतः उस क्रिया-प्रकार से अतीतादि व्यवहारकाल में भी वर्तमानत्व-व्यवहार हो जायगा । समर्थन—वह क्रियारूप प्रकार अतीतादि व्यवहारकाल में वर्तमान नहीं है । लक्षण में ‘वर्तमान जो क्रियारूप प्रकार, उस प्रकार से वह काल वर्तमान है' ऐसा निवेश होने से उक्त स्थल में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—अभी तक वर्तमान का लक्षण न होने से वर्तमान के निवेशविशेष को आप नहीं दिखा सकते । अर्थात् वर्तमान के लक्षण में वर्तमान का प्रवेश होने से आत्माश्रय हो जायगा । समर्थन—‘उस पाकादि क्रिया-काल में उस क्रिया से अवच्छिन्न काल, उस क्रिया-प्रकार से वर्तमान है।' खण्डन—काल काल का आश्रय नहीं हो सकता, कारण
परिच्छेद ] वर्तमानत्वादि-लक्षणों का खण्डन ५२५ श्रयतया निरूपणसम्भवात्कालान्तरस्यानभ्युपगमात् , तस्यैव कालस्य तदाश्रय- वत्त्वे व्यक्तमात्माश्रयत्वापत्तेः । स्यादेतत्—ग्राहकविज्ञानविषयो ग्राहकविज्ञानाश्रयश्च कालो वर्तमानः, वर्तमानोपाधिप्रागभावावच्छिन्नश्च पूर्वः, तत्प्रध्वंसाभावावच्छिन्नश्चानागतः । प्रागभावप्रध्वंसयोश्च स्वाभाविकमेव भेदमादाय व्यवस्था । प्राग्व्यवस्थाहेतुरभावः प्रागभाव इति स्वभावभूतस्यैव विशेषस्य कार्यमादाय लक्षणम्, अनागत- व्यवस्थानिदानमभावः प्रध्वंस इति च प्रध्वंसस्येति । मैवम् ; ज्ञानास्वप्रकाशतापक्षे स्वोपहितस्य स्वयं ग्रहणानुपपत्तेः कथं वर्तमा- नताग्रहः ? ज्ञानान्तरेण च तथाग्रहे वर्तमानतावभासाङ्गीकारे 'तदाऽसौ दृष्टो मये'ति प्रत्ययस्य 'तदाऽसौ मया दृश्यते' इत्याकारतापत्तिः । वह एक है । दो काल तो आपके मत में भी हैं नहीं। फिर उसी काल को उसी काल का अधिकरण मानें, तो आत्माश्रय हो जायगा । अतः यह भी लक्षण अयुक्त है । समर्थन—'ग्राहक-ज्ञान का विषय होकर ग्राहक-ज्ञान का आश्रय जो काल, वह वर्तमान है' यह वर्तमान का लक्षण हो सकता है । इसी तरह 'वर्तमान जो उपाधि ( सूर्यादि-क्रिया ), उसके प्रागभाव से अवच्छिन्न काल' अतीत है तथा 'वर्तमान उपाधि के ध्वंसाभाव से अवच्छिन्न काल' भविष्यत् है, ऐसे लक्षण कर सकते हैं । प्रागभाव तथा प्रध्वंसाभाव का जो स्वाभाविक भेद ( स्वरूपरूप विशेष ) है, उसको लेकर ही परस्पर भेद-व्यवस्था हो जायगी । प्रागभाव के स्वभावभूत विशेष के प्राग्व्यवस्थारूप कार्य का ग्रहण कर 'प्राग्व्यवस्था ( उपाधि की पूर्व अवस्था ) का हेतु जो अभाव, वह प्रागभाव है', यह लक्षण हो सकता है और अनागत व्यवस्था ( उपाधि की उत्तर अवस्था ) का कारण' ध्वंसाभाव है । खंडन—जो ज्ञान को स्वप्रकाश नहीं मानते, उनके मत में ज्ञानघटित उक्त लक्षण से उपहित वर्तमान काल का ग्रहण कैसे होगा ? यदि कहें कि अन्य ज्ञान से लक्षणघटक ज्ञान का ग्रहण होने से लक्षणयुक्त वर्तमान काल का भी अन्य ज्ञान से ही ग्रहण होगा, तो 'तदाऽसौ दृष्टो मया' इत्याकारक ज्ञान में 'तदाऽसौ दृश्यते' इस प्रकार वर्तमानाकारतापत्ति हो जायगी । कारण 'स्वग्राहक ज्ञान का विषय तथा स्वग्राहक ज्ञान का-आश्रय जो काल, तद्विषय पर देवदत्तरूप' उक्त वाक्यार्थ का उक्त अतीत ज्ञानस्थल में बाध नहीं है, किन्तु सम्भव ही है।
५२६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्ये [ चतुर्थ अत एव स्वप्रकाशपक्षेऽप्यनिस्तारः । यावानर्थः स्वप्रकाशे वर्तमानतयोक्त- स्तावत एव परेण ग्रहणे व्यभिचारात्, स्वप्रकाशतायाश्चाधिक्येऽपि विषये विशेषाभावात् । स्वरूपमेव विशेष इति चेन्न । तस्यानुगमाननुगमाभ्यामनुपपत्तेः । प्राक्प्रध्वंसा- भावयोश्च स्वरूपतोऽविशेषेऽपि कतरो भूतव्यवहारस्य कतरश्च अनागतव्यवहार- स्योपाधिरित्यनुयुक्ते कार्यभेदजनकत्या च तन्निरुक्तावुत्तरे पूर्वप्रत्युक्तां पूर्वता- परतानिरुक्तिं विना जन्यजनकत्वाज्ञानमिति । उपाधिभेदाच्च कालभेदे योऽप्येकतयाऽभिमतः कालः, सोऽपि चन्द्रसूर्यक्रिया- द्यसङ्ख्योपाधिभेदसम्भवेन नाना स्यात् । तत्रायमेवोपाधिर्नायमिति चाविनि- 'ज्ञान स्वप्रकाश है' इस मत में भी 'तदाऽसौ दृश्यते' यह आकार होने लगेगा । इसी दोष से वर्तमान का उक्त लक्षण अयुक्त है। कारण जो अर्थ स्वप्रकाश-मत में वर्तमानत्वरूप से उक्त है, उसी अर्थ का 'तदाऽसौ दृष्टः' इस स्थल में अन्य ज्ञान से भी ग्रहण है । 'जो काल स्वप्रकाश ज्ञान का आश्रय हो, वह वर्तमान है' इस प्रकार यदि लक्षण में स्वप्रकाश यह अधिक विशेषण दें, तब भी लक्ष्यभूत वर्तमानरूप विषयों में किसी विशेषण का लाभ नहीं होता । समर्थन—'स्वप्रकाश ज्ञान का ही विषय हो, अन्य का नहीं' इस प्रकार निवेश करने से लक्ष्य में भी विशेष हो जायगा । खंडन— ऐसा लक्षण करने पर लक्षणघटक 'स्व' शब्द से यदि चैत्रज्ञान का ग्रहण करें, तो मैत्रज्ञान में और मैत्रज्ञान का ग्रहण करें, तो चैत्रज्ञान में अव्याप्ति हो जायगी। यदि लक्ष्यभेद से लक्षण का भेद मान लें, तो अनुगम दोष हो जायगा । किञ्च—प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव दोनों ही अभाव हैं, अतः इनके स्वरूप में तो कोई विशेष है नहीं। फिर 'कौन-सा अभाव भूत-व्यवहार का और कौन-सा अनागत व्यवहार का हेतु है' यह प्रश्न होने पर कार्यभेद (-प्रागवस्था, अनागत-अवस्था ) के जनकत्व से दोनों अभावों में भेद बतलाकर उक्त प्रकार से उत्तर हो नहीं सकता। कारण जबतक अतीतत्व का लक्षण न हो, तबतक कारण का लक्षण न होने से अन्योन्याश्रय हो जायगा । किञ्च—उपाधि-भेद से वर्तमान आदि कालों के भेद की कल्पना करें, तो जो एक ही वर्तमान काल है, वह भी सूर्य, चन्द्र आदि की क्रियारूप उपाधियों के भिन्न भिन्न होने से अनेकरूप हो जायगा। सूर्य की क्रिया ही उपाधि है, चन्द्र की क्रिया नहीं,
परिच्छेद ] संशय-लक्षण का खण्डन ५२७ गम्यत्वात् । प्रतिक्षणस्वभावभेदादिपन्ते च नानाक्षणेषु वर्तमानत्वादिव्यवहारार्थ- मुपाध्यनुसरणावश्यम्भावेन उक्तोपाधिदोषग्रासस्यैवाऽऽपातादिति । संशय-लक्षण-खण्डनम् ननु तथापि तावद्विषयभेदेनावश्यं भवितव्यम्, प्रतीतिभेदस्य दुरपह्नवत्वात् । अतः सामान्यतः सिद्धौ विशेषतो विवेचनाशक्तौ भेदे संशय एवास्तामिति चेन्न । संशयस्यापि निर्वक्तुमशक्यत्वात् । तथाहि-- संशयस्य निश्चयात्किमुपाधिकृतो विशेषः, उत जातिकृतः ? आद्ये किं विषयविशेषेणोपाधिना, उत कारणविशेषेण, उतान्येनैव केन- चित्सम्बन्धिना कृतः ? न प्रथमः; तस्यानिर्वचनात् । उभयकोटिविषयः संशय इति चेन्न । कोटिद्वयसमुच्चयनिश्चयस्यापि संशयत्व- इसमें कुछ प्रमाण नहीं। इसी तरह जो बौद्ध प्रतिक्षण काल का स्वाभाविक भेद मानते हैं, उनके मत में भी अनेकक्षणसमूह में उपाधि-भेद के बिना वर्तमानादि-व्यवहार हो नहीं सकता । अतः सूर्यादिक्रियारूप उपाधि अवश्य माननी पड़ेगी और उसे मानने में पूर्वोक्त दोष स्पष्ट हैं । संशय-लक्षण का खण्डन समर्थन--वर्तमानादि प्रतीतियों ( 'वर्तते, वर्त्स्यति, अवर्तिष्ट' आदि प्रतीतियों) का भेद अनुभवसिद्ध होने से उनके विषय-भेदों का अपलाप नहीं किया जा सकता । प्रतीति निर्विषय तो हो नहीं सकती, अतः विषय का रहना निर्विवाद है । एवञ्च उस विषय का कालविशेष का लक्षण करना संभव न होने के कारण 'अयमसो' इस प्रकार विशेष-दर्शन असंभव होने से विशेषाग्रहणसहित सामान्यग्रहण काल-विषयक संशय उत्पन्न करता है । तथाच संशयीय एककोटि-प्रविष्टतया काल की सिद्धि हो ही जायगी । खण्डन--संदेह का लक्षण भी आप नहीं कर सकते । देखिये, संदेह में निश्चय से भेद क्या उपाधिकृत है या जातिकृत ? प्रथम पक्ष में विषयविशेष उपाधि है, कारणविशेष या अन्य ही कोई सम्बन्धी उपाधि है, जिससे संदेह में भेद है ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं; कारण विषयकृत निश्चय से संशय में भेद है, इसमें कोई प्रमाण नहीं । समर्थन--'एकधर्मी में उभयकोटियों का अवगाही ज्ञान संदेह है।' खंडन--एक
प्रसङ्गात् । प्रतीतिरेव नैवमिति चेन्न । भेदाभेदप्रतीतीनां शाब्दस्वाप्नादि- प्रतीतीनां च तादृशां सम्भवात् । समुच्चयप्रकाशे कोट्योरविरोधः प्रकाशते, संशये तु विरोध इति चेन्न । 'पीतः शङ्खः' इत्यादिषु पीतत्वशङ्खत्वादेर्भिन्नाश्रयतानियमं विरोधं जानतोऽपि प्रत्ययात् । तथापि तस्यां बुद्धौ न भासते विरोध इति चेन्न । कथमेवमिति प्रकाशेऽपि तत्प्रकाशात् । तयोरेकाश्रययोर्विरोधप्रतीतेरवश्योपेयत्वात् । मिथ्याधियस्ता इति चेन्न । संशयस्यापि भवद्भिरतत्त्वबुद्धितयाऽङ्गीकारात् । तत्त्वातत्त्वबुद्धयोश्च तद्विषयत्वेन विशेषाभावात् । नहि मिथ्यारजतबुद्धौ रजतबुद्धिरेव न भवति । अव्यवस्थितकोटिद्वयविषयः संशय इति चेत्; केयमव्यवस्थितता ? धर्मी में उभयकोटियों के अवगाही निश्चय में संशय-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। 'एकधर्मी में विरुद्ध कोटिद्वय का अवगाही निश्चय होता ही नहीं' ऐसा नहीं कह सकते, कारण भेदाभेदवादी के मत में 'भिन्न और अभिन्न यह घट है' यह प्रतीति तथा शब्द से स्वप्न में भी ऐसी प्रतीति होती है। 'निश्चय में दोनों कोटियों का विरुद्धत्व नहीं भासता और संशय में वह भासता है—यही दोनों में भेद है' ऐसा भी नहीं कह सकते । कारण पीतत्व और शङ्खत्व के भिन्नाश्रयत्वरूप विरोध को जो जानता है, उसे भी पित्तरोग-काल में 'पीत शङ्खः' ऐसी प्रतीति होती ही है। समर्थन—यद्यपि पीतत्व और शंखत्व विरुद्ध हैं, तथापि उक्त निश्चय में विरोध नहीं भासता । खंडन—'पीतः शंखः कथम्' ऐसी विरोधविषयक प्रतीति भी होती है, कारण पीतत्व और शंखत्व की एकाधिकरण में प्रतीति निश्चय ही विरोधविषयक माननी होगी । समर्थन—'पीतः शंखः' यह प्रतीति भ्रम है, अतः अतिव्याप्ति नहीं । कारण संशय के लक्षण में 'यथार्थत्वे सति' यह भी निवेश है। खण्डन—यदि संशय के लक्षण में 'यथार्थत्वे सति' निवेश करें, तो संशय के अयथार्थ होने से असम्भव हो जायगा। किञ्च—तत्त्वबुद्धि और अतत्त्वबुद्धि दोनों के विरुद्धकोटिद्वयावगाही होने से संशयत्व में कोई विशेष नहीं है, कारण मिथ्या रजत-बुद्धि भी रजतबुद्धि ही है । अर्थात् जहाँ शुक्ति में 'रङ्गं रजतं वा' ऐसा संशय होता है, वहाँ अव्याप्ति के भय से संशय के लक्षण में 'यथार्थत्वे सति' यह निवेश नहीं कर सकते । समर्थन—'अव्यवस्थित जो कोटिद्वय, वह जिसका विषय हो, वह संशय है', ऐसा लक्षण करेंगे। खंडन—'अव्यवस्थितता' क्या वस्तु है ? यदि आप कहें, अव्यवस्थितता
परिच्छेद ] संशय-लक्षण का खण्डन ५२६ पाक्षिकतेति चेत्; न पर्यायं पृच्छामः, अपितु किं कोटिद्वयस्वरूपमेव उत कोटिद्वयस्य धर्मः कश्चित् ? आद्ये कोटिद्वयनिश्चयेन सहाविशेषस्तदवस्थः। द्वितीये यद्यसौ केनचित्प्रमाणेन सिद्धस्तदा तस्यैव कोटिद्वयाश्रिततद्धर्मविषयस्य संशयत्वप्रसङ्गेन प्रमाणत्वव्याघातः। अथ कस्यचित्प्रमाणस्य नासौ विषयः; नास्ति तर्हि विषयकृतो विशेषः । एतेन—अन्योऽपि यः कश्चिद्विषयविशेषः स्थाणुतदभाव-पुरुषतदभावादिरूपो- ऽभिधीयते, सोऽपि निरस्तो वेदितव्यः । अत्यन्तासत एव च तस्य प्रतिभासे जितं जिनैरसत्ख्यातिवादिभिः । क्वचित्सतश्चेत्तत्रैव प्रसङ्गः । नापि द्वितीयः ; कारणविशेषो हि विशिष्य सामग्री स्यात्तदेकदेशो वा ? पाक्षिकता है, तो यह पर्याय-कथन हुआ । हम तो पर्याय नहीं पूछते, किन्तु पाक्षिकता कोटिद्वय का स्वरूप है या कोटिद्वय का धर्म ? यह पूछते हैं । प्रथम पक्ष में ‘पीतः शङ्खः’ इस कोटिद्वय के निश्चय में अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । द्वितीय पक्ष में यदि वह पाक्षिकता किसी प्रमाण से सिद्ध है, तो वह प्रमाण कोटि- द्वय में आश्रित पाक्षिकता-विषयक होने से संशय हुआ । फिर वह प्रमाण कैसे हो सकता है ? यदि पाक्षिकता किसी प्रमाण से सिद्ध नहीं है, तो विषयकृत संशय में कुछ विशेषता सिद्ध नहीं हुई । ‘स्थाणुत्व, पुरुषत्व आदि जो संदेह के विषय हैं, तद्-रूप या तन्निष्ठ कोई अतिशय अनुभवसिद्ध है और तद्विषयक ज्ञान संशय है’ यह कथन भी उक्त युक्ति से खण्डित है । अर्थात् यदि वह अतिशय प्रमाणसिद्ध है, तो प्रमाणत्व का व्याघात है । यदि प्रमाण से असिद्ध है, तो प्रमाण के अभाव से अतिशय ही असिद्ध है । यदि कहें कि संशय में अत्यन्त असत् ही अतिशयरूप भासता है, तो असत् का स्वीकार होने से आपके लिए अपसिद्धान्त हुआ और शून्यवादी बौद्ध विजयी हुए । यदि कहें कि वह क्वचित् सत् है, तो जिस प्रमाण से वह सिद्ध हुआ, उसी प्रमाण में उस संशय-लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । ‘'संशय में कारणकृत विशेष है' यह द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है; क्योंकि वह कारणविशेष सामग्री है या सामग्री का एकदेश ? ६७
५१० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ नाद्यः; तस्या अप्रत्यक्षत्वेन तदुपहितस्य प्रत्यक्षतोऽवगमानुपपत्तेः। न च तस्या अनुमेयत्वम्; लिङ्गासम्भवात्। कार्यविशेष एव लिङ्गमिति चेन्न । कार्यगतस्यैव विशेषस्य चिन्त्यमानस्याद्याप्यप्राप्तेः जातिभेदस्य दूषणीयत्वात्। नापि द्वितीयः ; दृश्यस्य तदेकदेशस्य साधारणधर्मदर्शनादेर्विशेषद्वयस्मरणा- देश्च साधारणधर्मविशेषद्वयज्ञानप्रत्यक्षादावपि हेतुत्वेन साधारणत्वात् । अदृश्ये च तस्मिँल्लिङ्गाभावात् । तेन कार्ये विशेषजात्याधानस्य निरस्यत्वात्। तस्या अविषयत्वेन अनुव्यवसायसाक्षिककार्यगतविशेषीभवनासामर्थ्यात् । नापि तृतीयः ; तस्य दर्शयितुमशक्यत्वात् । यदि सामग्री कहें, तो सामग्री का प्रत्यक्ष न होने से उक्त लक्षणयुक्त संशय का भी प्रत्यक्ष नहीं होगा। लिङ्ग के न होने से वह सामग्री अनुमेय भी नहीं है। समर्थन—कार्य-विशेष ( संशय ) ही लिङ्ग है। खंडन—संशयगत विशेष का ही तो विचार हो रहा है और अबतक कुछ भी निश्चित नहीं हुआ है। 'संशयत्व जाति है' इस पक्ष का तो आगे खण्डन करेंगे । 'सामग्री के एकदेश से संशय में विशेष है' यह द्वितीय पक्ष भी अयुक्त है; क्योंकि संशय का दृश्य कारण साधारणधर्म का दर्शन या विशेषद्वय का स्मरण है। वे दोनों स्वप्रत्यक्ष ( अपने अनुव्यवसाय ) के भी कारण हैं। अतः यदि वे संशयत्व-व्यवहार के कारण हों, तो उनके अनुव्यवसाय में भी संशयत्व-व्यवहार होने लगेगा। यदि अदृश्य सामग्री के एकदेश को विशेष मानें, तो उसमें कोई प्रमाण नहीं है। यदि संशयत्व जाति को लिङ्ग कहें तो उसका ( संशयत्व जाति का ) आगे निरास करने- वाले ही हैं। यदि कहें कि 'संदेह्मि' इत्याकारक प्रत्यक्ष ? अनुभवसिद्ध संशयत्व जाति का आगे आप के द्वारा निरास करने पर भी संशय में कोई अन्य अतीन्द्रिय कारणवृत्ति उपाधि मान लेंगे, तो वह भी ठीक नहीं। कारण वह उपाधि प्रत्यक्ष की अविषय होनेसे अनुव्यवसायसाक्षिक 'मम संशयो जातः' इत्याकारक जो संशयज्ञानात्मक कार्य है, उसका विशेष होने की सामर्थ्य ही उसमें नहीं है। अथवा प्रत्यक्षात्मक अनुव्यवसाय उक्त अतीन्द्रिय कारणाधेया उपाधि में प्रमाण न होने से अन्य कोई प्रमाण कहना होगा । वह अशक्य होने से ऐसी उपाधि मान नहीं सकते । 'विषय या कारण से अन्य किसी सम्बन्धिकृत संशय में विशेष है' यह तृतीय पक्ष भी ठीक नहीं है; कारण उसे दिखा नहीं सकते ।
परिच्छेद ] संशय-लक्षण का खण्डन ५३१ न च द्वितीयः ; धर्मिस्वरूपादेरपि तद्विषयतया संशयितत्वप्रसङ्गात् । न चैवं 'न ह्ययं स्थाणुर्वा पुरुषो वे'ति संशये सति इदमा परामृश्यमानस्य ऊर्ध्वत्वशालिनो धर्मिणः स्वरूपसत्त्वेऽपि स्वरूपमेव भवति न वेति तद्द्रष्टुरभिमानो व्यवहारो वा, किं नाम ? तत्र स्वरूपसत्त्वमात्रांशावलम्बिनस्तस्य ज्ञानस्य निश्चयत्वमेव । ततः किमिति चेत् , एकस्यैव ज्ञानस्य निश्चयत्वसंशयत्वजातिसङ्करः । स प्रामाण्याप्रामाण्यवद् भविष्यतीति चेन्न । अत एव हि तयोरपि जातित्वा- नङ्गीकारः । किं नाम ? तथाभूतातथाभूतार्थतालक्षणोपाधिद्वयरूपताङ्गीकार एव तयोः । यदा च संशयत्वनिश्चयत्वलक्षणजातिद्वयसम्भिन्नं तद्विज्ञानमास्थीयते तदा कञ्चिद्विषयमपेक्ष्य संशयत्वं कञ्चिदपेक्ष्य निश्चयत्वमित्यापेक्षिकी जातिव्यव- स्थितिरित्यपूर्वः पन्थाः । ईदृशस्य पथः पान्थेनापि भवता किं नियामकमभिधेयम्, येन धर्मिणि तस्य निश्चयत्वं व्यवतिष्ठते, विशेषद्वये च संशयत्वम् । 'संशय में संशयत्व जाति अनुभवसिद्ध है, उसीसे संशय में निश्चय से भेद है' यह द्वितीय कल्प भी अयुक्त है । कारण संशयत्व जाति को भेदक मानें, तो धर्मी भी उसका विषय होने से उस अंश में भी वह ज्ञान संशय हो जायगा । किन्तु धर्मी- अंश में वह ज्ञान संशय नहीं है, कारण 'स्थाणु है या पुरुष' इस संशय-काल में 'इदम्' शब्द से परामृष्ट ऊर्ध्वत्वशाली धर्मी के स्वरूपसत्त्व में 'स्वरूप है या नहीं' ऐसा अभिमान या व्यवहार किसीको नहीं होता, किन्तु स्वरूप-अंश में वह ज्ञान निश्चय ही है । यदि कहें, धर्मी-अंश में उक्त ज्ञान का निश्चय होने से क्या हुआ ? तो यह हुआ कि एक ज्ञान में निश्चयत्व और संशयत्व दोनों जातियों का सङ्कर हो जाने से संशयत्व जाति ही सिद्ध नहीं हुई । यदि कहें कि गुण-जाति में संकर-दोष नहीं होता, अतः प्रमात्व-अप्रमात्व के तुल्य निश्चयत्व और संशयत्व दोनों का एक ही ज्ञान में संकर होने पर भी क्या हानि है, तो वह भी ठीक नहीं । सङ्कर-दोष होने से ही प्रमात्व-अप्रमात्व को भी हम जाति नहीं मानते । किन्तु 'तथाभूतार्थत्व' तो प्रमात्व है और 'अतथाभूतार्थत्व' अप्रमात्वं है, ऐसा मानते हैं । यदि एक ही ज्ञान में किसी विषय की अपेक्षा संशयत्व जाति और किसी विषय की अपेक्षा निश्चयत्व जाति मानें, तो आपने यह आपेक्षिकी (आंशिकी) जाति-व्यवस्थारूप अपूर्व मार्ग का स्वीकार किया । इस अपूर्व पथ के पथिक होकर भी आप किसे नियामक कहेंगे, जिससे धर्मी-अंश में उस ज्ञान के निश्चयत्व और विशेषद्वय-अंश में संशयत्व व्यवस्थित हो ।
५३२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ विशेषदर्शनादर्शने इति चेत् ; तर्हि भवति स्थाणोः स्थाणुत्वं पुरुषत्वं पुरुषस्य विशेषः प्रतीयते चासाविति विशेषदर्शनात्तत्रापि निश्चयप्रसङ्गः । संशयात्पूर्व्वं नास्ति विशेषदर्शनमिति युक्तस्तत्रापि संशय इति चेन्न । धर्मिधियः पूर्व्वं तर्हि कथं तद्गतविशेषदर्शनं स्यात् । संशयकाले चास्ति विशेष- दर्शनमित्यनन्तरं तर्हि संशयाननुवृत्तिप्रसङ्गोऽपि युक्त एव । तदीयविषयाद्विशेषाद् व्यतिरिक्तस्य विशेषस्य दर्शनं विवक्षितमिति चेन्न । ‘स्थाणुर्वा पुरुषो वे’ति संशयानन्तरं ‘दारुमयो मांसमयो वाऽयमि’ति संशयो नोपपद्येत, तदुभयमयत्वातिक्तिोः स्थाणुत्वपुरुषत्वयोर्विशेषयोः पूर्वज्ञानेनो- ल्लिखितत्वात् । अन्यतरविशेषदर्शनं संशयप्रतिरोधकम्, संशयेन तु उभयोरुपदर्शनम्, अतो नोक्तदोषप्रसङ्ग इति चेत् ; तर्हि स्थाणुः पुरुषश्चेति कुतोऽपि विभ्रमे जाते ‘दारुमयो समर्थन—विशेष का दर्शन और अदर्शन ही क्रमशः निश्चयत्व और संशयत्व के प्रयोजक मानेंगे । खंडन—तब तो स्थाणु में स्थाणुत्वरूप विशेष है और पुरुष में पुरुषत्वरूप विशेष है ही और उनकी प्रतीति भी होती है । अतः विशेष-दर्शन होने से विशेषद्वय-अंश में भी निश्चयत्व हो जायगा । समर्थन—संशय से पूर्वकाल में विशेषदर्शन नहीं है, अतः उस अंश में संशयत्व युक्त ही है । खण्डन—तब तो उक्त ज्ञान के धर्मी-अंश में भी निश्चयत्व न होना चाहिए । कारण उस ज्ञान से पूर्वकाल में विशेष दर्शन नहीं है । किञ्च—संशयरूप विशेषदर्शन होने से संशय से उत्तरकाल में संशय-धारा की अनुवृत्ति भी नहीं होनी चाहिए । समर्थन— संशय के विषय जो कोटिद्वयरूप विशेष, उनसे अन्य विशेष का दर्शन संशय का प्रतिबन्धक है, ऐसा कहेंगे । एवञ्च संशय-धारा की अनुवृत्ति में कोई प्रतिबन्धक नहीं है । खण्डन—तब तो ‘स्थाणु है या पुरुष’ इस संशय के अनन्तर ‘दारूमय है या मांसमय’ यह संशय नहीं होगा ; कारण दारूमयत्व और मांसमयत्वरूप जो उस संशय के विषय हैं, उनसे अन्य स्थाणुत्व-पुरुषत्वरूप विशेष का दर्शन पूर्वकाल में हो चुका है । समर्थन—एक विशेष का दर्शन संशय का प्रतिबन्धक है । संशय में तो दोनों विशेषों का दर्शन है, अतः संशय के बाद उक्त संशय का प्रतिरोध नहीं होता ।
परिच्छेद ] संशय-लक्षण का खण्डन ५३३ वा मांसमयो वा' इति संशयप्रतिरोधो न स्यात्, पूर्वज्ञानेन विशेषद्वयोपदर्शनस्य कृतत्वात् । विशेषदर्शनं हि विशेषनिश्चयो विवक्षितो न तु विशेषज्ञानमात्रम्, येन संशयोपनीतादपि विशेषात्संशयप्रतिरोधः प्रसज्येतेति चेत् । मैवम्; संशयेन यावुप- दर्शितौ विशेषौ तत्र न संशयस्य निश्चयत्वमिति व्यवस्थायां सिद्धायामुप- दर्शितनियामकसिद्धिर्भवति । सिद्धे चास्मिनियामके संशयस्य विशेषद्वयं प्रति निश्चयत्वं नास्तीति सिद्ध्येदित्यन्योन्याश्रयापत्तेः को वारयिता ? स्यादेतत्—संशयज्ञानस्य धर्मिविषयत्वेऽप्युपगम्यमाने अर्धवैशसमपद्येत । तच्च तदनभ्युपगम एव निवर्तते । तेन धर्मिज्ञानं निश्चयात्मकमन्यदेव, 'स्थाणुर्वा पुरुषो वे'ति चान्यदेव संशयज्ञानमित्यभ्युपैष्याम इति चेत् । मैवम्; एकधर्मिसम्बन्धोपनयनव्यतिरेकेण स्थाणुत्वपुरुषत्वयोर्विरोध एव नास्तीति 'स्थाणुर्वा पुरुषो वे'त्येतदेव न स्यात् । न हि यस्य कस्यचित्स्थाणुत्वेन खंडन—तब तो किसी कारण 'स्थाणुः पुरुषश्च' ऐसा भ्रम होने पर 'दारुमयो वा मांसमयो वा' इस संशय का प्रतिरोध नहीं होगा; कारण पूर्वज्ञान का विषय एक नहीं, दो हैं । समर्थन—'विशेष-दर्शन' शब्द से विशेष-निश्चय विवक्षित है, ज्ञानमात्र नहीं । अतः संशयोपनीत विशेष-विषय से संशय का प्रतिरोध नहीं होता । खंडन—'संशय के विशेषद्वय अंश में निश्चयत्व नहीं है' इस व्यवस्था के सिद्ध होने पर 'विशेष-निश्चय संशय का प्रतिबन्धक है' यह नियम सिद्ध होगा और इस नियम के सिद्ध होने पर उक्त "स्थाणुर्वा पुरुषो वा' यह ज्ञान विशेषद्वय-अंश में संशय है", यह सिद्ध हो सकेगा, इस प्रकार अन्योन्याश्रय हो जायगा । इस अन्योन्याश्रय का वारण कौन करेगा ? समर्थन—यदि संशय को धर्मी-अंश में निश्चयात्मक मानें, तो एक ही ज्ञान में अंशभेद से संशयत्व और निश्चयत्व दोनों के होने से संकर हो जायगा । वह संशय में निश्चयत्व अस्वीकार करने पर ही निवृत्त हो सकता है । अतः धर्मी का निश्चयरूप ज्ञान अन्य ही है और 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' इत्याकारक धर्म-अंश में संशय-ज्ञान अन्य ही है, ऐसा मानेंगे । खंडन—जबतक एक धर्मी में सम्बन्ध की प्रतीति न हो, तबतक स्थाणुत्व और पुरुषत्व का विरोध ही नहीं है। फलतः 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' यह उसका आकार ही नहीं होगा; कारण जिस किसीके स्थाणुत्व से जिस किसीका पुरुषत्व विरुद्ध
५३४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ यस्य कस्यचित्पुरुषत्वं विरुद्धयते । एकधर्मिसम्बन्धमनन्तर्भाव्य विरोधे जगति तयोरन्योन्यस्य व्यतिषक्तोरसत्त्वमेव प्रसज्येत । तस्य धर्मिणो वा पुरुषत्व- निश्चयाद्यथा संशयो निवर्त्तते नोत्पद्यते वा, तथा स्वात्मनः पुरुषत्वनिर्णयात्संशयो निवर्त्तेत नोत्पद्येत वा । विशेषाभावाद्यथाऽयं द्रष्टुर्न स्वशरीरविषयः संशयः, तथैव पुरोवर्तिविषयोऽपि नासौ । कथं चेदमर्थेन सामानाधिकरण्याभिमानः—'योऽयमूर्ध्वताधर्मा स किं स्थाणुरुत पुरुषः' इति । कस्माद्वा प्रत्यभिज्ञानादयोऽप्येकं ज्ञानमङ्गीकृता इत्यु- च्छिन्ना विशिष्टज्ञानसङ्कथा । सञ्जातश्च 'गौरश्वः पुरुषः' इतिवद्विशकलितो विज्ञानसंसार इत्यास्तां विस्तराभिनिवेशः । नन्वस्ति तावदयं स्थाणुर्वा पुरुषो वेति परस्परविरुद्धार्थावगाही प्रत्ययः, स स्वविषयं तथाभूतमुपस्थापयिष्यति । न; उक्तबाधकैः सर्वप्रकारखण्डने परि- शेषासम्भवात् । नहीं है । यदि एक धर्मी के सम्बन्ध के बिना भी विरोध हो, तो अन्योन्य के नाशक उन दोनों का जगत् में असत्त्व ही हो जायगा । अथवा उस धर्मी में पुरुषत्व-निश्चय से जैसे संशय की निवृत्ति या अनुपपत्ति होती है, वैसे ही अपनी आत्मा में पुरुषत्व-निश्चय से भी संशय की निवृत्ति या अनुत्पत्ति हो जायगी । कारण जैसे विशेष न होने से यह संशय द्रष्टा के शरीर-विषयक नहीं है, वैसे ही पुरोवर्ती-विषयक भी नहीं है । किञ्च—यदि संशय धर्मी-विषयक नहीं है, तो 'जो यह ऊर्ध्व है, वह स्थाणु है या पुरुष' इस तरह इदमर्थ के साथ सामानाधिकरण्य का अभिमान कैसे होता है ? प्रत्यभिज्ञा आदि को भी एक ज्ञान कैसे मानते हैं । वहाँ 'सः' इस अंश को भिन्न ज्ञान कह ही सकते हैं । इस प्रकार दो ज्ञानों को भी एक मानें, तो विशिष्ट ज्ञान का नाम ही उच्छिन्न हो जायगा । गौ, अश्व, पुरुष जैसे भिन्न-भिन्न हैं, वैसे ही विज्ञान- संसार भी विशकलित हो जायगा । बस, इतना ही संशय का खण्डन पर्याप्त है, अतः विस्तार का आग्रह न रखें । समर्थन—'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' इत्याकारक परस्पर विरुद्ध अर्थों का अवगाहन करनेवाला ज्ञान होता है, वही ज्ञान परस्पर विरुद्ध स्वविषय ( संशय ) में प्रमाण होगा । खण्डन—पूर्वोक्त प्रकार से संशय में विषय, कारण या जातिकृत विशेषत्व खण्डित हो जाने से संशय और उसका विषय अनिर्वचनीय ही है ।
परिच्छेद ] भावाभाव-विरोध का खण्डन ५३५ भावाभाव-विरोध-खण्डनम् यच्च स्वरूपमादाय विरुद्धार्थत्वमभिधीयते, तदपि निर्वक्तुं न शक्यते । तथाहि—भावतदभावयोः को विरोधः ? सहानवस्थानमिति चेन्न । देशभेदेन सहाप्यवस्थानात् । देशाभेदेनेति चेन्न । संयोगाद्यव्यापकत्वं यद्यभ्युपैषि तथाप्यनुपपत्तिः, प्रकारभेदेन तथाभावस्याभ्युपगमात् । तस्य पक्षे एकेन प्रकारेणैकस्मिन् सहानवस्थानं विरोधः, संयोगाद्यव्या- पक्त्वानभ्युपगन्तृपक्षे च देशाभेदेन सहानवस्थानं स इति चेन्न । तद्धि तदुभया- वस्थानसाहित्यनिषेधो वा तदुभयावस्थाननिषेधसाहित्यं वा स्यात् । आद्ये- ऽप्रसिद्धप्रतियोगिकत्वम्, तदुभयावस्थानसाहित्यस्य क्वचिदप्यप्रमितेः । शशविषाण- भावाभाव-विरोध का खण्डन किञ्च—भाव और अभाव के जिन परस्पर विरोधी स्वरूपों को ग्रहण कर आपने संशय में जो विरुद्धार्थत्व (विरुद्धधर्म-विषयत्व) का अभिधान किया है, उसका (भावाभाव के विरोध का) भी निर्वचन अशक्य है । आखिर बताइये, भाव और अभाव का विरोध क्या है ? निर्वचन—सह-अनवस्थान विरोध है । खण्डन—यह ठीक नहीं, कारण देश-भेद से भाव का तदभाव के साथ [एक काल में] अवस्थान होता ही है । समर्थन—एकदेश में सह-अनवस्थान विरोध है । खण्डन—यह भी युक्त नहीं; कारण जो आचार्य संयोग और तदभाव को अव्याप्यवृत्ति मानते हैं, उनके मत में मूल- शाखादि प्रकार-भेद से संयोग और तदभाव का वृक्षादिरूप एकदेश में भी अवस्थान होता ही है । समर्थन—जो संयोगादि को अव्याप्यवृत्ति मानते हैं, उनके मत में एक प्रकार से एकदेश में सह-अनवस्थान विरोध है । जो संयोगादि को अव्याप्यवृत्ति नहीं मानते, उनके मत में एकदेश में सह-अनवस्थान विरोध है । खण्डन—'सह-अनवस्थान' शब्द का क्या अर्थ है—क्या उभय के अवस्थान के साहित्य का निषेध अर्थ है या उभय के अवस्थान के निषेध का साहित्य है ? प्रथम कल्प में उभयावस्थान साहित्य रूप प्रतियोगी की अप्रसिद्धि से सह-अनवस्थान भी अप्रसिद्ध है । 'गवि शशविषाणं
५३६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ निषेधादेश्च शशके विषाणनिषेधादिरूपत्वाङ्गीकारेण प्रसिद्धप्रतियोगिकत्वा- भ्युपगमात् । यदाह एकः—'वस्तुनः प्रतियोगिता'ति । अन्यश्च— 'लब्धरूपं क्वचित्किञ्चित्तादृगेव निषिध्यते ।'—इति । द्वितीये तु तदुभयावस्थानसाहित्यस्वीकार एव स्यात्, तदुभयनिषेधयो- स्तदुभयत्वैवाङ्गीकारात् । परस्परप्रतिक्षेपकत्वं विरोध इति चेन्न । तद्धि परस्परप्रतिक्षेपं प्रति कारणत्वं नास्ति' यहाँ शश के शिरोरूप प्रमित धर्मी में गौ में प्रमित विषाण का आरोप कर उसका निषेध होने से वह अभाव प्रसिद्धप्रतियोगिक ही है । एक आचार्य, उदयनाचार्य 'कुसुमाञ्जलि' में कहते हैं कि अभावाभाव का प्रतियोगित्व वस्तुनिष्ठ ही हो सकता है । उनके मत में 'गवि शशशृंगं नास्ति' यह प्रसिद्धि होती ही नहीं । किन्तु दूसरे आचार्य, मण्डन मिश्र 'ब्रह्मसिद्धि' के तर्ककाण्ड (कारिका २) में कहते हैं कि जो कहीं लब्धरूप होता है, उसीका अन्यत्र निषेध होता है । एवञ्च पूर्वोक्त प्रकार से 'शशशृंगं नास्ति' की गति लग सकती है । द्वितीय पक्ष में उभय के अवस्थान का साहित्य ही स्वीकार करना होगा । वह हो नहीं सकता, कारण भाव का निषेध अभावरूप और अभाव का निषेध भावरूप ही होता है । समर्थन—परस्पर प्रतिक्षेपकत्व ही विरोध है । खण्डन—'परस्पर प्रतिक्षेपकत्व' शब्द का परस्पर प्रतिक्षेप (निषेध) का कारण, यह अर्थ है या परस्पर के प्रतिक्षेप का तादात्म्य अर्थ है ? प्रथम पक्ष अयुक्त है; कारण घट का कार्य घटाभाव है और घटाभाव का कार्य घट है, इसमें कुछ प्रमाण नहीं है । द्वितीय पक्ष भी अयुक्त ही है, कारण उभय (भावाभाव) में अनुगत प्रतिक्षेप का निर्वचन नहीं हो सकता । १. पूरा वचन इस प्रकार है—'अभावविरहात्मत्वं वस्तुनः प्रतियोगिता ।' २. पूरी कारिका इस प्रकार है—'लब्धरूपं क्वचित्किञ्चित्तादृगेव निषिध्यते । विधानमन्त- रेणातो न निषेधस्य संभवः ॥'