खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ निषेधादेश्च शशके विषाणनिषेधादिरूपत्वाङ्गीकारेण प्रसिद्धप्रतियोगिकत्वा- भ्युपगमात् । यदाह एकः—'वस्तुनः प्रतियोगिता'ति । अन्यश्च— 'लब्धरूपं क्वचित्किञ्चित्तादृगेव निषिध्यते ।'—इति । द्वितीये तु तदुभयावस्थानसाहित्यस्वीकार एव स्यात्, तदुभयनिषेधयो- स्तदुभयत्वैवाङ्गीकारात् । परस्परप्रतिक्षेपकत्वं विरोध इति चेन्न । तद्धि परस्परप्रतिक्षेपं प्रति कारणत्वं नास्ति' यहाँ शश के शिरोरूप प्रमित धर्मी में गौ में प्रमित विषाण का आरोप कर उसका निषेध होने से वह अभाव प्रसिद्धप्रतियोगिक ही है । एक आचार्य, उदयनाचार्य 'कुसुमाञ्जलि' में कहते हैं कि अभावाभाव का प्रतियोगित्व वस्तुनिष्ठ ही हो सकता है । उनके मत में 'गवि शशशृंगं नास्ति' यह प्रसिद्धि होती ही नहीं । किन्तु दूसरे आचार्य, मण्डन मिश्र 'ब्रह्मसिद्धि' के तर्ककाण्ड (कारिका २) में कहते हैं कि जो कहीं लब्धरूप होता है, उसीका अन्यत्र निषेध होता है । एवञ्च पूर्वोक्त प्रकार से 'शशशृंगं नास्ति' की गति लग सकती है । द्वितीय पक्ष में उभय के अवस्थान का साहित्य ही स्वीकार करना होगा । वह हो नहीं सकता, कारण भाव का निषेध अभावरूप और अभाव का निषेध भावरूप ही होता है । समर्थन—परस्पर प्रतिक्षेपकत्व ही विरोध है । खण्डन—'परस्पर प्रतिक्षेपकत्व' शब्द का परस्पर प्रतिक्षेप (निषेध) का कारण, यह अर्थ है या परस्पर के प्रतिक्षेप का तादात्म्य अर्थ है ? प्रथम पक्ष अयुक्त है; कारण घट का कार्य घटाभाव है और घटाभाव का कार्य घट है, इसमें कुछ प्रमाण नहीं है । द्वितीय पक्ष भी अयुक्त ही है, कारण उभय (भावाभाव) में अनुगत प्रतिक्षेप का निर्वचन नहीं हो सकता । १. पूरा वचन इस प्रकार है—'अभावविरहात्मत्वं वस्तुनः प्रतियोगिता ।' २. पूरी कारिका इस प्रकार है—'लब्धरूपं क्वचित्किञ्चित्तादृगेव निषिध्यते । विधानमन्त- रेणातो न निषेधस्य संभवः ॥'