खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] भावाभाव-विरोध का खण्डन ५३५ भावाभाव-विरोध-खण्डनम् यच्च स्वरूपमादाय विरुद्धार्थत्वमभिधीयते, तदपि निर्वक्तुं न शक्यते । तथाहि—भावतदभावयोः को विरोधः ? सहानवस्थानमिति चेन्न । देशभेदेन सहाप्यवस्थानात् । देशाभेदेनेति चेन्न । संयोगाद्यव्यापकत्वं यद्यभ्युपैषि तथाप्यनुपपत्तिः, प्रकारभेदेन तथाभावस्याभ्युपगमात् । तस्य पक्षे एकेन प्रकारेणैकस्मिन् सहानवस्थानं विरोधः, संयोगाद्यव्या- पक्त्वानभ्युपगन्तृपक्षे च देशाभेदेन सहानवस्थानं स इति चेन्न । तद्धि तदुभया- वस्थानसाहित्यनिषेधो वा तदुभयावस्थाननिषेधसाहित्यं वा स्यात् । आद्ये- ऽप्रसिद्धप्रतियोगिकत्वम्, तदुभयावस्थानसाहित्यस्य क्वचिदप्यप्रमितेः । शशविषाण- भावाभाव-विरोध का खण्डन किञ्च—भाव और अभाव के जिन परस्पर विरोधी स्वरूपों को ग्रहण कर आपने संशय में जो विरुद्धार्थत्व (विरुद्धधर्म-विषयत्व) का अभिधान किया है, उसका (भावाभाव के विरोध का) भी निर्वचन अशक्य है । आखिर बताइये, भाव और अभाव का विरोध क्या है ? निर्वचन—सह-अनवस्थान विरोध है । खण्डन—यह ठीक नहीं, कारण देश-भेद से भाव का तदभाव के साथ [एक काल में] अवस्थान होता ही है । समर्थन—एकदेश में सह-अनवस्थान विरोध है । खण्डन—यह भी युक्त नहीं; कारण जो आचार्य संयोग और तदभाव को अव्याप्यवृत्ति मानते हैं, उनके मत में मूल- शाखादि प्रकार-भेद से संयोग और तदभाव का वृक्षादिरूप एकदेश में भी अवस्थान होता ही है । समर्थन—जो संयोगादि को अव्याप्यवृत्ति मानते हैं, उनके मत में एक प्रकार से एकदेश में सह-अनवस्थान विरोध है । जो संयोगादि को अव्याप्यवृत्ति नहीं मानते, उनके मत में एकदेश में सह-अनवस्थान विरोध है । खण्डन—'सह-अनवस्थान' शब्द का क्या अर्थ है—क्या उभय के अवस्थान के साहित्य का निषेध अर्थ है या उभय के अवस्थान के निषेध का साहित्य है ? प्रथम कल्प में उभयावस्थान साहित्य रूप प्रतियोगी की अप्रसिद्धि से सह-अनवस्थान भी अप्रसिद्ध है । 'गवि शशविषाणं