भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 556

५३४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ यस्य कस्यचित्पुरुषत्वं विरुद्धयते । एकधर्मिसम्बन्धमनन्तर्भाव्य विरोधे जगति तयोरन्योन्यस्य व्यतिषक्तोरसत्त्वमेव प्रसज्येत । तस्य धर्मिणो वा पुरुषत्व- निश्चयाद्यथा संशयो निवर्त्तते नोत्पद्यते वा, तथा स्वात्मनः पुरुषत्वनिर्णयात्संशयो निवर्त्तेत नोत्पद्येत वा । विशेषाभावाद्यथाऽयं द्रष्टुर्न स्वशरीरविषयः संशयः, तथैव पुरोवर्तिविषयोऽपि नासौ । कथं चेदमर्थेन सामानाधिकरण्याभिमानः—'योऽयमूर्ध्वताधर्मा स किं स्थाणुरुत पुरुषः' इति । कस्माद्वा प्रत्यभिज्ञानादयोऽप्येकं ज्ञानमङ्गीकृता इत्यु- च्छिन्ना विशिष्टज्ञानसङ्कथा । सञ्जातश्च 'गौरश्वः पुरुषः' इतिवद्विशकलितो विज्ञानसंसार इत्यास्तां विस्तराभिनिवेशः । नन्वस्ति तावदयं स्थाणुर्वा पुरुषो वेति परस्परविरुद्धार्थावगाही प्रत्ययः, स स्वविषयं तथाभूतमुपस्थापयिष्यति । न; उक्तबाधकैः सर्वप्रकारखण्डने परि- शेषासम्भवात् । नहीं है । यदि एक धर्मी के सम्बन्ध के बिना भी विरोध हो, तो अन्योन्य के नाशक उन दोनों का जगत् में असत्त्व ही हो जायगा । अथवा उस धर्मी में पुरुषत्व-निश्चय से जैसे संशय की निवृत्ति या अनुपपत्ति होती है, वैसे ही अपनी आत्मा में पुरुषत्व-निश्चय से भी संशय की निवृत्ति या अनुत्पत्ति हो जायगी । कारण जैसे विशेष न होने से यह संशय द्रष्टा के शरीर-विषयक नहीं है, वैसे ही पुरोवर्ती-विषयक भी नहीं है । किञ्च—यदि संशय धर्मी-विषयक नहीं है, तो 'जो यह ऊर्ध्व है, वह स्थाणु है या पुरुष' इस तरह इदमर्थ के साथ सामानाधिकरण्य का अभिमान कैसे होता है ? प्रत्यभिज्ञा आदि को भी एक ज्ञान कैसे मानते हैं । वहाँ 'सः' इस अंश को भिन्न ज्ञान कह ही सकते हैं । इस प्रकार दो ज्ञानों को भी एक मानें, तो विशिष्ट ज्ञान का नाम ही उच्छिन्न हो जायगा । गौ, अश्व, पुरुष जैसे भिन्न-भिन्न हैं, वैसे ही विज्ञान- संसार भी विशकलित हो जायगा । बस, इतना ही संशय का खण्डन पर्याप्त है, अतः विस्तार का आग्रह न रखें । समर्थन—'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' इत्याकारक परस्पर विरुद्ध अर्थों का अवगाहन करनेवाला ज्ञान होता है, वही ज्ञान परस्पर विरुद्ध स्वविषय ( संशय ) में प्रमाण होगा । खण्डन—पूर्वोक्त प्रकार से संशय में विषय, कारण या जातिकृत विशेषत्व खण्डित हो जाने से संशय और उसका विषय अनिर्वचनीय ही है ।