भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 555

परिच्छेद ] संशय-लक्षण का खण्डन ५३३ वा मांसमयो वा' इति संशयप्रतिरोधो न स्यात्, पूर्वज्ञानेन विशेषद्वयोपदर्शनस्य कृतत्वात् । विशेषदर्शनं हि विशेषनिश्चयो विवक्षितो न तु विशेषज्ञानमात्रम्, येन संशयोपनीतादपि विशेषात्संशयप्रतिरोधः प्रसज्येतेति चेत् । मैवम्; संशयेन यावुप- दर्शितौ विशेषौ तत्र न संशयस्य निश्चयत्वमिति व्यवस्थायां सिद्धायामुप- दर्शितनियामकसिद्धिर्भवति । सिद्धे चास्मिनियामके संशयस्य विशेषद्वयं प्रति निश्चयत्वं नास्तीति सिद्ध्येदित्यन्योन्याश्रयापत्तेः को वारयिता ? स्यादेतत्—संशयज्ञानस्य धर्मिविषयत्वेऽप्युपगम्यमाने अर्धवैशसमपद्येत । तच्च तदनभ्युपगम एव निवर्तते । तेन धर्मिज्ञानं निश्चयात्मकमन्यदेव, 'स्थाणुर्वा पुरुषो वे'ति चान्यदेव संशयज्ञानमित्यभ्युपैष्याम इति चेत् । मैवम्; एकधर्मिसम्बन्धोपनयनव्यतिरेकेण स्थाणुत्वपुरुषत्वयोर्विरोध एव नास्तीति 'स्थाणुर्वा पुरुषो वे'त्येतदेव न स्यात् । न हि यस्य कस्यचित्स्थाणुत्वेन खंडन—तब तो किसी कारण 'स्थाणुः पुरुषश्च' ऐसा भ्रम होने पर 'दारुमयो वा मांसमयो वा' इस संशय का प्रतिरोध नहीं होगा; कारण पूर्वज्ञान का विषय एक नहीं, दो हैं । समर्थन—'विशेष-दर्शन' शब्द से विशेष-निश्चय विवक्षित है, ज्ञानमात्र नहीं । अतः संशयोपनीत विशेष-विषय से संशय का प्रतिरोध नहीं होता । खंडन—'संशय के विशेषद्वय अंश में निश्चयत्व नहीं है' इस व्यवस्था के सिद्ध होने पर 'विशेष-निश्चय संशय का प्रतिबन्धक है' यह नियम सिद्ध होगा और इस नियम के सिद्ध होने पर उक्त "स्थाणुर्वा पुरुषो वा' यह ज्ञान विशेषद्वय-अंश में संशय है", यह सिद्ध हो सकेगा, इस प्रकार अन्योन्याश्रय हो जायगा । इस अन्योन्याश्रय का वारण कौन करेगा ? समर्थन—यदि संशय को धर्मी-अंश में निश्चयात्मक मानें, तो एक ही ज्ञान में अंशभेद से संशयत्व और निश्चयत्व दोनों के होने से संकर हो जायगा । वह संशय में निश्चयत्व अस्वीकार करने पर ही निवृत्त हो सकता है । अतः धर्मी का निश्चयरूप ज्ञान अन्य ही है और 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' इत्याकारक धर्म-अंश में संशय-ज्ञान अन्य ही है, ऐसा मानेंगे । खंडन—जबतक एक धर्मी में सम्बन्ध की प्रतीति न हो, तबतक स्थाणुत्व और पुरुषत्व का विरोध ही नहीं है। फलतः 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' यह उसका आकार ही नहीं होगा; कारण जिस किसीके स्थाणुत्व से जिस किसीका पुरुषत्व विरुद्ध