खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५३२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ विशेषदर्शनादर्शने इति चेत् ; तर्हि भवति स्थाणोः स्थाणुत्वं पुरुषत्वं पुरुषस्य विशेषः प्रतीयते चासाविति विशेषदर्शनात्तत्रापि निश्चयप्रसङ्गः । संशयात्पूर्व्वं नास्ति विशेषदर्शनमिति युक्तस्तत्रापि संशय इति चेन्न । धर्मिधियः पूर्व्वं तर्हि कथं तद्गतविशेषदर्शनं स्यात् । संशयकाले चास्ति विशेष- दर्शनमित्यनन्तरं तर्हि संशयाननुवृत्तिप्रसङ्गोऽपि युक्त एव । तदीयविषयाद्विशेषाद् व्यतिरिक्तस्य विशेषस्य दर्शनं विवक्षितमिति चेन्न । ‘स्थाणुर्वा पुरुषो वे’ति संशयानन्तरं ‘दारुमयो मांसमयो वाऽयमि’ति संशयो नोपपद्येत, तदुभयमयत्वातिक्तिोः स्थाणुत्वपुरुषत्वयोर्विशेषयोः पूर्वज्ञानेनो- ल्लिखितत्वात् । अन्यतरविशेषदर्शनं संशयप्रतिरोधकम्, संशयेन तु उभयोरुपदर्शनम्, अतो नोक्तदोषप्रसङ्ग इति चेत् ; तर्हि स्थाणुः पुरुषश्चेति कुतोऽपि विभ्रमे जाते ‘दारुमयो समर्थन—विशेष का दर्शन और अदर्शन ही क्रमशः निश्चयत्व और संशयत्व के प्रयोजक मानेंगे । खंडन—तब तो स्थाणु में स्थाणुत्वरूप विशेष है और पुरुष में पुरुषत्वरूप विशेष है ही और उनकी प्रतीति भी होती है । अतः विशेष-दर्शन होने से विशेषद्वय-अंश में भी निश्चयत्व हो जायगा । समर्थन—संशय से पूर्वकाल में विशेषदर्शन नहीं है, अतः उस अंश में संशयत्व युक्त ही है । खण्डन—तब तो उक्त ज्ञान के धर्मी-अंश में भी निश्चयत्व न होना चाहिए । कारण उस ज्ञान से पूर्वकाल में विशेष दर्शन नहीं है । किञ्च—संशयरूप विशेषदर्शन होने से संशय से उत्तरकाल में संशय-धारा की अनुवृत्ति भी नहीं होनी चाहिए । समर्थन— संशय के विषय जो कोटिद्वयरूप विशेष, उनसे अन्य विशेष का दर्शन संशय का प्रतिबन्धक है, ऐसा कहेंगे । एवञ्च संशय-धारा की अनुवृत्ति में कोई प्रतिबन्धक नहीं है । खण्डन—तब तो ‘स्थाणु है या पुरुष’ इस संशय के अनन्तर ‘दारूमय है या मांसमय’ यह संशय नहीं होगा ; कारण दारूमयत्व और मांसमयत्वरूप जो उस संशय के विषय हैं, उनसे अन्य स्थाणुत्व-पुरुषत्वरूप विशेष का दर्शन पूर्वकाल में हो चुका है । समर्थन—एक विशेष का दर्शन संशय का प्रतिबन्धक है । संशय में तो दोनों विशेषों का दर्शन है, अतः संशय के बाद उक्त संशय का प्रतिरोध नहीं होता ।