खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५२२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ
च्छिन्नो भविष्यन्निति चेन्न । अतीतानागतप्रतीतिकालोऽपि क्रियावच्छिन्नः प्रतीयत इति वर्तमानप्रत्ययप्रसङ्गस्य तादवस्थ्यात्, क्रियानवच्छिन्नस्य तत्प्राग्- भावप्रध्वंसाभावावच्छेदानुपपत्तेः । प्रागभावश्च प्रागर्थानिरुक्तौ कथं न दुरधिगमः । प्रध्वंसस्यापि प्राग्- भावात्कथं विशेषो वक्तव्यः ? अभावो विनाशी प्रागभावः, उत्पत्तिमान् प्रध्वंस इत्यनयोर्विशेष इति चेन्न । को हि प्रागभावस्य विनाशो येन विनाशीत्युच्यते ? यदि प्रतियोगिभूतो घटादिः, प्रध्वंसस्यापि प्रागभाववत्प्रतियोगीति सोऽपि विनाशी प्राप्तः । उत्पत्तिमांश्च प्रध्वंस इत्युत्पत्तिपदार्थो विवेचनीयः । यद्यसौ असतः सत्त्वम्, से अवच्छिन्न काल भूत है और क्रिया के ध्वंसाभाव से अवच्छिन्न काल भविष्यत् है। खंडन—अतीत-अनागत की प्रतीतियों के काल में भी क्रिया से अवच्छिन्न ही काल प्रतीत होता है, अतः अतीत आदि की प्रतीति के काल में वर्तमान-प्रत्यय हो जायगा। कारण जो क्रिया से अनवच्छिन्न है, वह क्रिया के प्रागभाव या ध्वंसाभाव से अवच्छिन्न हो नहीं सकता । अर्थात् प्रतियोगी से अविशिष्ट नहीं, किन्तु प्रतियोगी से विशिष्ट ही प्रागभाव या ध्वंस की प्रतीति होती है। अतः ध्वंसादि से अवच्छिन्न काल ध्वंस के विशेषण क्रिया से अवश्य ही अवच्छिन्न रहेगा। कारण विशेषण के अवच्छिन्नत्व के बिना विशिष्ट से अवच्छिन्नत्व कहीं भी नहीं हो सकता। किञ्च—जबतक प्राक् शब्द के अर्थ का निर्वचन न हो, तबतक प्रागभाव शब्द का अर्थ भी दुर्ज्ञेय क्यों नहीं है और ध्वंसाभाव का प्रागभाव से भेद भी किस प्रकार होगा ? समर्थन--'विनाशी अभाव प्रागभाव है और उत्पत्ति से युक्त अभाव ध्वंसाभाव है' यही दोनों अभावों में भेद है। खण्डन—प्रागभाव का विनाश क्या वस्तु है जिससे वह 'विनाशी' कहा जाता है। यदि प्रतियोगीरूप घटादि को प्रागभाव का विनाश मानें, तो वही ध्वंस का भी विनाश है, अतः ध्वंस भी विनाशी हुआ । किञ्च—'उत्पत्तियुक्त अभाव ध्वंस है' यहाँ उत्पत्ति का भी विचार करना चाहिए कि वस्तुतः उत्पत्ति का क्या अर्थ है ? यदि कहें कि असत् का सत्त्व उत्पत्ति है और सत्त्व