भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] वर्तमानत्वादि-लक्षणों का खण्डन ५२३ तच्च सामान्यं तदाऽभावेऽसम्भव एव। अथ स्वरूपसत्त्वं तदा प्रागभावेऽपि प्रसङ्गः, तस्यापि कदाचिदसत्त्वात् । पूर्वमसतः पश्चात्सत्त्वं विवक्षितमिति चेन्न। पूर्वेदानींपश्चादर्थस्यैवा- निरूपणात् । एतेन कारणावच्छिन्नं सत्त्वमुत्पत्तिरित्यपि निरस्तम् । पूर्वापरनिर्वचनमन्त- रेण कारणार्थानिर्वचनात् । अस्तु तावदतीतानागतयोर्यथातथा निरुक्तिः । यत्क्रियावच्छिन्नो यः कालः स तत्क्रियापेक्षया वर्तमानो न त्वन्यापेक्षयेति चेत् ; तदपेक्ष्येति कोऽर्थः— किं तदुपधानेन, उत तदवधिकतया, उत तत्प्रतियोगिकतया, उत तेन प्रकारेणेत्येव ? नाद्यः; उपाध्यवच्छिन्नस्य अतीतानागतप्रतिपत्तिविषयत्वमपि तस्येत्य सकृदुक्तत्वात् । सत्ता जाति है, तो ध्वंसाभाव में सत्ता जाति न होने से असम्भव हो जायगा । यदि स्वरूप-सत्त्व है, तो प्रागभाव का भी कदाचित् कार्य की उत्पत्ति से पूर्व स्वरूपतः सत्त्व है ही । अतः प्रागभाव में ध्वंस के लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'पूर्वकाल में असत् का उत्तरकाल में जो स्वरूपसत्त्व है, वह उत्पत्ति है ।' खंडन—पूर्व, इदानीम्, और पश्चात् शब्दों के अर्थों का अद्यावधि निरूपण नहीं हुआ है । अर्थात् पूर्व (अतीत) के लक्षण में ध्वंसाभाव का, ध्वंसाभाव के लक्षण में उत्पत्ति का और उत्पत्ति के लक्षण में पूर्व का निवेश होने से चक्रक हो जायगा । समर्थन—कारण से अवच्छिन्न (कारण में समवेत) जिसका सत्त्व हो, वह उत्पत्ति है । प्रागभाव का सत्त्व कारण में समवेत नहीं है, अतः अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—कारण के लक्षण में 'पूर्व' का निवेश होने से पूर्वत्व का निर्वचन न होने तक कारणत्व की निरुक्ति नहीं हो सकती । अतः उक्त युक्ति से चक्रक हो जायगा । समर्थन—अतीत और अनागत कालों के चाहे जो लक्षण करें, सम्प्रति वर्तमान काल का यह लक्षण करते हैं कि 'जिस पाकादि क्रिया से अवच्छिन्न जो काल हो, वह उस क्रिया की अपेक्षा वर्तमान है, अन्य क्रिया की अपेक्षा नहीं । खण्डन—इस लक्षण में 'अपेक्षा' शब्द का क्या अर्थ है, क्रिया की उपाधि रूप से, अवधि रूप से, प्रतियोगी रूप से या प्रकार मात्र से अपेक्षा है ? इनमें प्रथम कल्प युक्त नहीं, कारण उक्त रीति से अतीत-अनागत व्यवहार-काल