भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 542

५२० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ मानादिबुद्धेरेव को विषयः ? कालविशेष इति चेन्न । कालस्य विशेषः स्वाभाविक औपाधिको वा ? नाद्यः ; कालस्य भवद्भिरेकत्वाभ्युपगमात् , य एव कालो वर्तमानः प्रतीयते, स एव पूर्वं भावीति पश्चात् भूत इति च न प्रतीयेत । त्रिविधस्वभाव एवासाविति चेन्न । भेदप्रसङ्गात् , व्यवस्थानुपपत्तिप्रसङ्गाच्च । यदैव वर्तत इति प्रत्ययस्तदैव वृत्तो वर्तिष्यत इति प्रत्ययप्रसङ्गात् । द्वितीयश्चेदुपाधिरभिधीयताम् । सूर्यादिक्रियासम्बन्धभेदः स इति चेन्न । भूतभविष्यतोरपि क्रियासम्बन्धप्रत्ययस्यावश्यं वक्तव्यत्वात् । य एव दिवसः सूर्यगतिविशेषावच्छिन्नो वर्तत इति प्रतीतः, स एव हि तदवच्छिन्नो वृत्त इत्य- वगम्यते वर्त्स्यन्निति च । न हि निर्विशेषस्य कालस्य तदतीतत्वं प्रतीयतेऽनाग- तत्वं वा, किन्तु उपाधिविशेषेणैवावच्छिन्नस्य । येनैवासौ पूर्वं दिनान्तरात् प्रामाण्य का ज्ञान दुर्लभ होने से अन्योन्याश्रय है । यदि कहें कि कालविशेष वर्तमान है, तो काल का वह विशेष स्वाभाविक है या औपाधिक ? इनमें प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण काल को आप एक मानते हैं । अतः जो काल वर्तमानत्वरूप से प्रतीत होता है, वही पहले भविष्यत्त्वरूप से और पीछे भूतत्वरूप से प्रतीत नहीं होगा । एक ही काल का त्रिविध स्वभाव है, यह कथन भी युक्त नहीं । कारण स्वभाव के भेद से काल का भी भेद हो जायगा । यदि विरुद्ध धर्मत्रय को एक काल का स्वभाव मान लें, तब भी जिस काल में 'वर्तते' यह प्रतीति होती है, उसी काल में 'वृत्तः, वर्तिष्यते' ऐसी प्रतीति हो जायगी । कारण तीनों स्वभाव काल में रहते हैं, अतः सदा तीनों व्यवहार होने चाहिए । काल का विशेष औपाधिक है, यह द्वितीय पक्ष मानें, तो उपाधि क्या है, यह कहिये । यदि कहें कि सूर्यादि-क्रिया का सम्बन्ध उपाधि है, तो भूत-भविष्यत् में भी सूर्य-क्रिया के सम्बन्ध की प्रतीति अवश्य मानेंगे । कारण जिस सूर्य के गतिविशेष से युक्त जो दिवस 'वर्तते' इस प्रतीति का विषय है, वही उसी सूर्यक्रिया से युक्त 'वृत्तः, वर्तिष्यते' इस प्रतीति का भी विषय होता है । विशेष उपाधि से रहित काल में अतीतत्व, अनागतत्व की प्रतीति नहीं होती, किन्तु उपाधिविशेष ( सूर्यक्रिया ) से अवच्छिन्न में ही अतीतत्वादि की प्रतीति होती है । जिस उपाधि से अवच्छिन्न वह