खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 532, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें५१० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थे कार्यसत्त्वकालश्च सामग्र्यभावात् न तज्जननकाल इति तदानीं तज्जननविशिष्टता कथमध्यक्ष्या स्यात् , प्राक्तदग्रहणेन संस्कारसाचिव्यस्याप्यसम्भवात् । एवं क्वचिदपि हेतुत्वे साक्षात्कारासम्भवेन किंमूलव्याप्तिग्रहात्तत्रानुमाऽपि स्यात् । प्रतिबन्दी चानिर्वचनवादिनि न स्थाने । कादाचित्कत्वानुपपत्त्या तद्ग्रह इति चेन्न । वैयधिकरण्यात् । कथमपि सामानाधिकरण्ये तदुपपादकस्योपपाद्यवदनुपपत्तौ अविशेषादविश्रान्तिः, नानादि- त्वेनाऽपि शक्योपपादना । ही न होने से—प्रत्यक्ष नहीं होगा । उत्पत्ति से उत्तरकाल-में पूर्वकाल के न होने से पूर्वकालवृत्तित्वरूप कारणत्व ही नहीं है, तो किसका प्रत्यक्ष होगा ? पूर्वकाल में कारणता का ज्ञान न होने से इस काल में कारणताविषयक संस्कार भी नहीं है । अतः प्रत्यभिज्ञा में तत्ता के तुल्य, संस्कार के बल से प्रत्यक्ष में कार्यताविशिष्ट कारणता भासती है, यह भी नहीं कह सकते । 'इस तरह जब कभी भी कारणता का प्रत्यक्ष नहीं होता, तो किस प्रमाण के बल पर व्याप्तिग्रह होगा और जब व्याप्तिग्रह नहीं होगा, तो कारणता की अनुमिति भी कैसे होगी ? फिर यदि कारणताग्रह नहीं होता, तो दूसरे के ज्ञानार्थ वाग्व्यवहार में तथा तृषा-निवृत्ति के लिए जलपान में प्रवृत्ति भी कैसे होगी ?' यह प्रतिबन्दी भी ठीक नहीं । कारण अनिर्वचनीयतावादियों के मत में स्वप्नवत् प्रवृत्ति हो ही सकती है । एवञ्च यह प्रतिबन्दी भी खण्डित ही है । समर्थन— भले ही अनुमान से कारणत्व का ग्रह न हो; घट, पट आदि कार्य अनित्य हैं, उनकी अनुपपत्तिरूप अर्थापत्ति प्रमाण से ही उसका ग्रह हो सकता है । खण्डन — यह भी संभव नहीं, क्योंकि कारणत्व कारण में है और अनित्यत्व कार्य में है, अर्थात् दोनों व्यधिकरण हैं । यदि कहें कि कार्य के कादाचित्कत्व से कार्य में ही सकारणत्व की कल्पना होती है । एवञ्च किसी प्रकार दोनों समानाधिकरण हो जायें, तो भी उस कारण में भी कादाचित्कत्व से सकारणत्व की कल्पना, कारण के कारणमें भी वैसी कल्पना—इस प्रकार अनवस्था हो जायगी । अनादि होने से बीजाङ्कुर के तुल्य अनवस्था दोष नहीं है, यह भी नहीं कह सकते । कारण जब कहीं कारणत्व प्रमाणसिद्ध ( इष्ट ) होता, तब अनादित्व से अनवस्था का परिहार हो सकता । जहाँ कारणत्व प्रथमतः सिद्ध ही नहीं, विप्रतिपन्न है, वहाँ बीजाङ्कुर के तुल्य अनादित्व से अनवस्था का परिहार भी कैसे होगा ?