भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 529

'परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५०७ न तत्र प्राचि पूर्वभावो नियतः, किन्तु वृष्टेः परं भाव इति चेन्न । प्राग्रूपाणामेव नियतत्त्वात् । तानि कारणमेवेति चेन्न । निदानप्राग्रूपसाङ्कर्य- प्रसङ्गात् । पूर्वार्थश्च वक्तव्यः । पूर्वकालसम्बन्धित्वं पूर्वत्वमिति चेन्न । कालस्याकारणत्वप्रसङ्गात् । तस्यापि किं पूर्वत्वमिति विवेचनीयत्वात् । अतीतोपाध्यवच्छिन्नत्वं तस्य पूर्वत्वमिति चेन्न । अतीत इति निष्ठान्तस्य पूर्वकालवाचिनो विवेचनीयत्वात् । परत्वापरत्वयोर्युगयोर्मध्ये यत्परत्वं तत्पूर्वत्व- समर्थन—पिपीलिकाण्ड-संचार में वृष्टि का पूर्वभाव नियत नहीं है, कारण उसके बिना भी वृष्टि देखी गयी है । अतः उसमें अतिव्याप्ति नहीं होगी । वृष्टि में पिपी- लिका के अण्डों के संचार का परभाव नियत है, यह अलग बात है, कारण उसका प्रकृत लक्षण में कुछ उपयोग नहीं है । खण्डन—रोग-प्राग्रूप में भी निरुपाधिक रोग का पूर्वभावित्व है, अतः वह भी कारण होने लगेगा । प्राग्रूप कारण ही है, ऐसी इष्टा- पत्ति नहीं कह सकते, कारण निदान और प्राग्रूप का साङ्कर्य हो जायगा, वैद्यक शास्त्र में इनको भिन्न-भिन्न कहा गया है¹ । किञ्च—लक्षणघटक ‘पूर्व’ शब्द का अर्थ भी कहना होगा । समर्थन—पूर्वकाल में सम्बन्धी को पूर्व कहते हैं । खंडन—काल में पूर्वकाल का सम्बन्ध न होने से काल कारण न कहलायेगा । किञ्च—काल में पूर्वत्व क्या वस्तु है, इसका भी विचार करना चाहिए । समर्थन—अतीत जो उपाधि उससे अवच्छिन्नत्व (युक्तत्व) ही कालमें पूर्वत्व है । खण्डन—‘अतीत’ इस पद में ‘निष्ठा’ का अर्थ भी पूर्वकाल ही है, अतः आत्मा- श्रय हो जायगा । कारण काल में पूर्वत्व का विवेक काल से ही होगा । समर्थन—‘नियतपूर्ववृत्तित्व कारणत्व है’ इस लक्षण में पूर्वशब्द परत्व गुणपरक है । १. ‘माधव-निदान’ में कहा गया है कि निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय और संप्राप्ति ये व्यस्त और समस्त रूपों से व्याधि के बोधक हैं । यथा— ‘निदानं पूर्वरूपाणि रूपाण्युपशयस्तथा । सम्प्राप्तिश्चेति विज्ञानं रोगाणां पञ्चधा स्मृतम् ॥’ जिस व्याधि का जो रूप है, वही अङ्कुरूप होने से जब अधिक व्यक्त नहीं होता, वह पूर्वरूप है !