खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५०६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ पगमे सामग्र्यामपि प्रसङ्गः । तस्या अपि च तथात्वोपगमे कार्यद्वयैक्यप्रसङ्गः । असाधारण्यञ्च विशेषापेक्षित्वे, अतिव्याप्तिरविशेषे, भाविपूर्वार्थविकल्पावकाशश्च । नियतप्राग्भावित्वमिति चेन्न । अवश्यम्भावस्य नियमार्थत्वे गगनादेः सर्वकार्य- हेतुत्वप्रसङ्गस्य तदवस्थत्वात् । अवयवरूपादेश्च अवयवितद्रसादिषु कारणत्वप्रसङ्गात् । अनौपाधिकत्वं नियमार्थ इति चेत् । एवं ह्यनौपाधिकपूर्वभावो हेतुत्वमि- त्युक्तं भवति । तथाच पिपीलिकोत्थानादेर्वृष्ट्यादौ जनकत्वप्रसङ्गः, सह- भाविसामग्र्या वा । कारण हो जायगा, क्योंकि 'यदि रूपप्राग्भावो न स्यात्तर्हि स रसपूर्ववर्ती स्यात्' ऐसा आपादन किया जा सकता है। यदि रूप-प्राग्भाव को रस का कारण मान लें, तो रूप की सामग्री भी रस-सामग्री हो जायगी । यदि रूप की सामग्री को रस-सामग्री भी मान लें, क्योंकि पाकज-स्थल में वह कारण होती ही है, तो दोनों कार्यों का ऐक्य हो जायगा। किञ्च—लक्षणघटक यत्-शब्द से यदि दण्डादि विशेष व्यक्ति का ग्रहण करें, तो लक्षण का अननुगम हो जायगा । अर्थात् वह लक्ष्यमात्र का संग्राहक न होगा । एवञ्च जिस कारण व्यक्ति का यत्-शब्द से उपादान करेंगे, उससे अन्यत्र अव्याप्ति हो जायगी । यत्-शब्द से कारणमात्र में वृत्ति एक उपसंग्राहक रूप न होने से कारणमात्र का उपादान नहीं हो सकता । यदि कथञ्चित् यत्-शब्द से सबका उपादान करें ( किसी प्रकार अनुगम कर लें ), तो कारणत्वरूप से अभिमत व्यक्तिमात्र के अनभ्युपगम में कार्यमात्र के पूर्वसत्त्व का भी आपादन संभव होने से कार्यमात्र में वस्तुमात्र कारण हो जायगा । अर्थात् घट में तन्तु भी कारण होने लगेगा । तथाच लक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी। वक्ष्यमाण पूर्वशब्दार्थ में विकल्प का भी अवकाश है, अर्थात् वक्ष्यमाण विकल्पों के कारण लक्षणघटक पूर्वशब्द के अर्थ का निर्वचन न हो सकने से भी यह लक्षण संभव नहीं है । समर्थन—'जो नियम से पूर्वभावी हो वह कारण है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन— 'नियम' शब्द का अवश्यम्भाव अर्थ करें, तो गगन आदि नित्य पदार्थ सभी कार्यों के कारण हो जायेंगे । साथ ही अवयव का रूप अवयवी के रस का भी कारण हो जायगा । समर्थन—नियम शब्द का, उपाधिरहितत्व अर्थ करेंगे । अर्थात् कार्य के साथ अविनाभावेन पूर्ववृत्तित्व कारणत्व है । एवञ्च पूर्वोक्त अतिव्याप्ति न होगी । खंडन— यदि ऐसा कहें तो पिपीलिकोत्थान भी वृष्टि का कारण हो जायगा । इसी तरह रूप की सामग्री रस का कारण हो जायगी ।