भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 525

परिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५०३ यद्विना यन्न जनयति, तत् तस्यावान्तरव्यापार इति चेन्न। सहकारिणामपि तथात्वप्रसङ्गात् । तज्जन्यमिति चेन्न। तथापि कारणत्वाव्यवस्थितौ विशेषोक्तेरति- प्रसक्तेः । कथमपि विशेषोक्तौ गगनादेः सर्वत्र कार्ये हेतुत्वप्रसङ्गात् । अनन्यथासिद्धपूर्वभावित्वमिति चेन्न । वक्तव्यं हि कस्मादन्येन प्रकारेण विना, का च सिद्धिरिति ? यदि हि कार्यादन्येन प्रकारेण न निष्पत्तिः, तदा- ऽसिद्धिः, नहि कार्येण कारणस्योत्पादनम् । नापि कार्यादन्येन प्रकारेण न ज्ञप्तिः, प्रत्यक्षादेरपि कारणत्वज्ञप्तेः, न खलु सर्वा कार्यलिङ्गजा कारणस्य ज्ञप्तिः । नापि कारणत्वात् व्यतिरिक्तेन प्रकारेण न निष्पत्तिर्ज्ञप्तिर्वा, ज्ञप्तावात्मा- श्रयात् । प्रकारान्तरवत्तयाऽपि च तदुपगमात् । समर्थन--'जो जिसके बिना जिसे उत्पन्न न कर सके, उस कार्य में वह उसका व्यापार है।' कुलाल के बिना भी उसका पिता घट का उत्पादन कर सकता है, अतः कुलाल व्यापार नहीं है । खण्डन - व्यापार का ऐसा लक्षण करने पर चक्ररूप सहकारी कारण भी दण्ड का व्यापार हो जायगा । कारण चक्र के बिना भी दण्ड घट का उत्पादन नहीं कर सकता । समर्थन-जो जिस स्वजन्यके बिना जिसे उत्पन्न न कर सके, उस कार्य में वह उसका व्यापार है। चक्र दण्डजन्य नहीं है, अतः वह व्यापार नहीं होगा। खण्डन - जबतक कारणत्व का लक्षण न हो, तबतक जन्यत्वघटित व्यापार का लक्षण ही हो नहीं सकता। किसी प्रकार व्यापार का लक्षण करें भी, तो कार्यमात्र के अव्यवहित पूर्ववर्ती होने से गगन भी कारण हो जायगा । समर्थन- 'अनन्यथासिद्ध पूर्वभावी कारण है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन-कहिये कि किससे अन्य प्रकार के बिना और सिद्धि क्या वस्तु है, अर्थात् सिद्धि शब्द का क्या अर्थ है ? 'कार्य से अन्य प्रकार से निष्पत्ति का अभाव' यह अर्थ हो, तो वह ठीक नहीं । कारण कार्य से कारण की उत्पत्ति नहीं होती । 'कार्य से अन्य प्रकार से ज्ञान का अभाव' यह अर्थ भी नहीं हो सकता; कारण प्रत्यक्ष से भी कारणत्व का ज्ञान होने से सभी कारणों का कार्यों से ज्ञान होता हो, ऐसा नियम नहीं है । 'कारणत्व से अन्य प्रकार से निष्पत्ति का अभाव या ज्ञान का अभाव' भी अर्थ नहीं हो सकता । कारण स्व में स्व की उत्पत्ति या ज्ञान न होने से आत्माश्रय हो जायगा । किञ्च - दण्डत्वरूप से भी दण्ड का ज्ञान हो सकने से 'कारणत्व से ही कारण का ज्ञान हो' यह कोई नियम नहीं है ।