खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 526, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें५०४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ व्यतिरिक्तत्वमकारणत्वमिष्टमिति चेन्न । उक्तदोषानिवृत्तेः, कारणत्वात् पूर्वं चोत्पत्तिज्ञप्त्योरक्षणिकवादिभिरभ्युपगमात् । अव्यवहितपूर्वतया कदाचित्तदपि कारणम् । एवं तत्पूर्वतरमपि, कस्याश्चित् व्यक्तेरनेवम्भावेऽपि तज्जातीयतया तथाभावित्वविवक्षिततया व्यक्तिव्यभिचारा- प्रयोजकत्वादिति चेन्न । कार्यान्तरेऽपि गगनादेरतथाभावस्य विनिगन्तुमशक्य- त्वात् । कालदेशव्यापकताऽन्यथासिद्धिस्थिति तदिति चेन्न । तथा सति शब्दादौ गगनादेरकारणत्वप्रसङ्गात् । एतेन — अनन्यथासिद्धान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वमपि व्युदस्तम् । गगनादे- र्व्यतिरेकाभावात्, अकारणत्वप्रसङ्गश्चाधिकः । व्यापारवत्त्वं कारणत्वमिति चेन्न । तद्धि व्यापारसमवायित्वं वा व्यापार- समर्थन — 'अन्यथा' शब्द का अर्थ व्यतिरिक्तत्व है और वह अकारणत्व है । एवञ्च 'अकारणत्वरूप से जिसका ज्ञान न हो और जो पूर्ववर्ती हो, वह कारण है' यह समुदायार्थ हुआ । खण्डन — कारणत्व के ज्ञान के बिना अकारणत्व का ज्ञान न होने से आत्माश्रय हो जायगा । किञ्च — स्थिरवादी के मत में कारणत्व से पूर्व भी दण्डादि का दण्डत्वादिरूप से ज्ञान होने से दण्डादि में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन — कदाचित् अव्यवहित-पूर्वक्षणवृत्तित्व होने से उससे पूर्वतर काल में भी वह कारण ही है । अर्थात् 'कार्याव्यवहितपूर्वक्षणसम्बन्धानधिकरणत्व' ही कारणत्व है । वह कारणत्व उस काल में भी विद्यमान है। उत्पन्न-विनष्ट तन्तु में कदाचित् भी पूर्व- क्षणवृत्तित्व न होने पर पूर्वक्षणवृत्ति-तन्तुजातीयत्व होने से ही कारणत्व होता है । जातीयत्वनिवेश की विवक्षा से ही एक-एक व्यक्ति में व्यभिचार नहीं होता । खण्डन — तब तो शब्द से अतिरिक्त घटादि में भी गगन कारण हो जायगा । यदि कहें कि देश तथा काल से व्यापक होने से गगन अन्यथासिद्ध है, तो शब्द में भी गगन कारण नहीं होगा । अन्यथासिद्धि का निर्दुष्ट लक्षण न होने से ही 'अनन्यथासिद्ध अन्वय तथा व्यतिरेक के कार्य में जिसका अनुविधान हो, वह कारण है' यह लक्षण भी खण्डित है । किञ्च — गगन का व्यतिरेक न होने से वह शब्द का अकारण हो जायगा । समर्थन — 'जिसमें व्यापार हो वह कारण है' ऐसा लक्षण करेंगे । कार्यान्तर में गगनादि व्यापार न होने से उसमें अतिव्याप्ति नहीं है । खण्डन — व्यापारवत्त्व क्या