भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 524

५०२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ ननु भेदप्रतिपत्तेस्तावत् प्रत्यक्षफलस्यार्थेन्द्रियसन्निकर्षः कारणमसाधारणं वक्तव्यम् । तत्र य एवेन्द्रियसन्निकर्षस्य भेदप्रतिपत्तिहेतोर्द्वितीयः सम्बन्धी, स एव भेदोऽस्तु । न; उक्तबाधकैर्बाधितायाः प्रतीतेरर्थसन्निकर्षकारणत्वाभावादिति । कारणत्व-लक्षण-खण्डनम् किं पुनस्तत्कारणत्वम् ? पूर्वभावित्वमिति चेन्न । चिरापध्वस्तानांमपि कारणत्वप्रसङ्गात् । अव्यवहित- पूर्वभावित्वमिति चेन्न । व्यापारस्यैव कारणत्वप्रसङ्गात् । व्यापारेण न व्यवधानमिति चेन्न । कारणकारणस्यापि कारणत्वप्रसङ्गात् । कारणास्यातद्व्यापारत्वात् नैवमिति चेन्न । विना विशेषोक्तिं तस्य दुर्विवेकत्वात् । समर्थन—प्रत्यक्ष है फल जिसका, ऐसी जो भेद-प्रतिपत्ति, उसका अर्थ और इन्द्रिय-सन्निकर्ष कारण कहना ही होगा । 'भेद-प्रतिपत्तिजनक उसी सन्निकर्ष का इन्द्रिय से भिन्न जो सम्बन्धी है, वह भेद है', ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—पूर्वोक्त युक्तियों से बाधित उक्त प्रतीति को अर्थ-इन्द्रिय-संन्निकर्ष से जन्य मानने में कुछ प्रमाण नहीं है । कारणत्व-लक्षण का खण्डन फिर वह कारणत्व भी क्या वस्तु है, अर्थात् लक्षण न होने से वह अनिर्वचनीय है । समर्थन—कार्य से पूर्ववर्ती कारण है । खंडन -- जो पूर्वभावी होता हुआ भी चिर-नष्ट है, अतएव कार्य से सम्बन्धरहित है, उसमें अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'कार्य से अव्यवहित पूर्ववर्ती कारण है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—स्वर्ग से अव्यवहित पूर्ववर्ती होने से अदृष्ट ही स्वर्ग का कारण होगा । अर्थात् यागरूप क्रिया, व्यवधान होने से, कारण न हो सकेगी । समर्थन—अपूर्व यागरूप क्रिया का व्यापार है और व्यापार से व्यापारी का व्यवधान नहीं होता, अतः याग में अव्याप्ति नहीं होगी । खंडन—घट के कारण (कुलाल) का कारण (कुलाल का पिता) भी घट का कारण हो जायगा । समर्थन— घटरूप कार्य में कुलाल अपने पिता का व्यापार नहीं है । खंडन—जबतक व्यापार का लक्षण न हो, तबतक अपूर्व याग का व्यापार है और कुलाल अपने पिता का व्यापार नहीं है, यह कैसे कह सकते हैं ?