खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] कारणत्व-लक्षण का खण्डन ५०३ यद्विना यद्यन्न जनयति, तत् तस्यावान्तरव्यापार इति चेन्न । सहकारिणामपि तथात्वप्रसङ्गात् । तज्जन्यमिति चेन्न । तथापि कारणत्वाव्यवस्थितौ विशेषोक्तेरति- प्रसक्तेः । कथमपि विशेषोक्तौ गगनादेः सर्वत्र कार्ये हेतुत्वप्रसङ्गात् । अनन्यथासिद्धपूर्वभावित्वमिति चेन्न । वक्तव्यं हि कस्मादन्येन प्रकारेण विना, का च सिद्धिरिति ? यदि हि कार्यादन्येन प्रकारेण न निष्पत्तिः, तदा- ऽसिद्धिः, नहि कार्येण कारणस्योत्पादनम् । नापि कार्याद्-येन प्रकारेण न ज्ञप्तिः, प्रत्यक्षादेरपि कारणत्वज्ञप्तेः, न खलु सर्वा कार्यलिङ्गजा कारणस्य ज्ञप्तिः । नापि कारणत्वात् व्यतिरिक्तेन प्रकारेण न निष्पत्तिर्ज्ञप्तिर्वा, ज्ञप्तावात्मा- श्रयात् । प्रकारान्तरवत्तयाऽपि च तदुपगमात् । समर्थन---'जो जिसके बिना जिसे उत्पन्न न कर सके, उस कार्य में वह उसका व्यापार है।' कुलाल के बिना भी उसका पिता घट का उत्पादन कर सकता है, अतः कुलाल व्यापार नहीं है। खण्डन - व्यापार का ऐसा लक्षण करने पर चक्ररूप सहकारी कारण भी दण्ड का व्यापार हो जायगा। कारण चक्र के बिना भी दण्ड घट का उत्पादन नहीं कर सकता । समर्थन-जो जिस स्वजन्यके बिना जिसे उत्पन्न न कर सके, उस कार्य में वह उसका व्यापार है। चक्र दण्डजन्य नहीं है, अतः वह व्यापार नहीं होगा। खण्डन - जबतक कारणत्व का लक्षण न हो, तबतक जन्यत्वघटित व्यापार का लक्षण ही हो नहीं सकता। किसी प्रकार व्यापार का लक्षण करें भी, तो कार्यमात्र के अव्यवहित पूर्ववर्ती होने से गगन भी कारण हो जायगा। समर्थन-'अनन्यथासिद्ध पूर्वभावी कारण है' ऐसा लक्षण करेंगे । खंडन-कहिये कि किससे अन्य प्रकार के बिना और सिद्धि क्या वस्तु है, अर्थात् सिद्धि शब्द का क्या अर्थ है ? 'कार्य से अन्य प्रकार से निष्पत्ति का अभाव' यह अर्थ हो, तो वह ठीक नहीं । कारण कार्य से कारण की उत्पत्ति नहीं होती । 'कार्य से अन्य प्रकार से ज्ञान का अभाव' यह अर्थ भी नहीं हो सकता; कारण प्रत्यक्ष से भी कारणत्व का ज्ञान होने से सभी कारणों का कार्यों से ज्ञानं होता हो, ऐसा नियम नहीं है। 'कारणत्व से अन्य प्रकार से निष्पत्ति का अभाव या ज्ञान का अभाव' भी अर्थ नहीं हो सकता । कारण स्व में स्व की उत्पत्ति या ज्ञान न होने से आत्माश्रय हो जायगा । किञ्च - दण्डत्वरूप से भी दण्ड का ज्ञान हो सकने से 'कारणत्व से ही कारण का ज्ञान हो' यह कोई नियम नहीं है।