खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतद्धर्मस्य तथात्वमिति चेन्न । तथाहि—न द्वितीयः, स एव सापेक्षप्रति- पत्तिर्भेदो न तु घटत्वादिः; घटत्वादेश्च स भेदः स्यात् , तद्धर्मकत्वात् । घटादेस्तु भेदपर्य्यनुयोगे तदभिधानमसङ्गतम् । कथञ्च भिन्नैरनुगतव्यवहारः स्यात् । तथापि तथा सति वा किन्न तैरेव तदादिव्यवहारोऽपि स्यात् । नापि द्वितीयः ; अनभ्युपगमात् । सप्तपदार्थानामनन्तर्भावप्रसङ्गात् , स्वात्मनि वृत्त्यवृत्तिभ्यामनुपपत्तेश्च । समर्थन—घटत्वादि का धर्म भेद है, और वही अवधि में सापेक्ष है। खंडन— यही द्वितीय कल्प है, पर वह भी युक्त नहीं। कारण वही, जिसकी सापेक्ष प्रतिपत्ति (प्रतीति) है, भेद मानिये, घटत्वादि को भेद क्यों मानते हैं? वह भेद घटत्वादि का धर्म होने से घटत्वादि का हुआ। अतः घटनिष्ठ भेद के प्रश्न पर उसका कथन असङ्गत है। किञ्च—यदि घटत्व-पटत्वादि प्रत्येकवृत्ति धर्म का भेद कहें, तो उस धर्म के एक-एक- निष्ठा होने से अनुगत भेदबुद्धि या भेद-व्यवहार कैसे होगा ? यदि च सर्वत्र अनुगत भेद न होने पर भी अनुगत भेदव्यवहार मान लें, तो वैसे ही अनुगत गोत्वादि के बिना भी अनुगत गवादि-व्यवहार हो जायगा। फिर गोत्वादि जातियों की कल्पना भी व्यर्थ हो जायगी। ‘भेद अन्य कोई धर्म है’ यह द्वितीय कल्प भी अयुक्त है, कारण वैसा धर्म अन्योन्याभाव ही हो सकता है। किन्तु अन्योन्याभाव खण्डित होने से उसका स्वीकार संभव ही नहीं है। अन्योन्याभाव से भिन्न ऐसा कोई धर्म भी नहीं है, जो सप्त पदार्थों में रहे और भेद-व्यवहार के योग्य हो। यदि ऐसे किसी विलक्षण धर्म को मान लें, तो उसका सप्तपदार्थों में अन्तर्भाव न होने से ‘सात ही पदार्थ हैं’ यह वैशेषिकों का विभाग असङ्गत हो जायगा। किंच—वह विलक्षणधर्मरूप भेद स्व (भेद) में रहता है या नहीं? यदि नहीं रहता, तो भेदरहित भेद सर्वात्मक होनेके कारण उसका सप्त पदार्थों में ही अन्तर्भाव हो जाने से भेद को अतिरिक्त मानना व्यर्थ है। यदि रहता है, तो वही भेद रहता है या अन्य? यदि वही रहता है, तो आत्माश्रय हो जायगा। यदि अन्य भेद रहता है, तो उस भेद में अन्य भेद, फिर उसमें भी अन्य भेद, इस तरह अनवस्था हो जायगी।