खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४८३ ईदृशाञ्च उपाध्यालीढवैचित्र्याणां जात्या समर्थने सर्वोपाध्युपधानानां जात्यैव समर्थनं स्यात् । ननु घटत्वादय एव भेदाः, घटत्वादिज्ञानाविशेषेऽपि च प्रतियोगिज्ञान- सहकारिवशाद्विचित्रव्यवहारोपपत्तिरिति चेन्न । व्यवहारसत्यत्वार्थं वास्तवानुगत- विशेषस्यावश्यं स्वीकर्तव्यत्वे तथैव पर्यनुयोगानुवृत्तेः । अनन्तभेदपरम्पराभ्युपगमे च तत्क्रमज्ञेयतायां प्रतीत्यपर्यवसानात् । तद्युग- पज्ज्ञेयतायामत्यन्तसदृशतया कस्यचिदन्यभेदस्यान्यदीयत्याऽपि ग्रहणसम्भवा- दिना सर्वत्र प्रामाण्यानाश्वासप्रसङ्गात् । सर्वप्रतीतिनियमानङ्गीकारे चाप्रतीतसत्त्वे प्रमाणाभावात् । समर्थन—सप्तपदार्थों में वृत्ति भेद को जाति ही क्यों न मानें ? खण्डन—प्रति- योगित्व, अधिकरणत्व आदिरूप उपाधियों से जिसमें वैचित्र्य है, ऐसे भेद को भी यदि जाति मानें, तो प्रमेयत्वादि को भी जाति ही मान लीजिये । फिर उपाधिमात्र का उच्छेद ही हो जायगा । समर्थन—घटत्व आदि ही भेद हैं । घटत्व आदि के ज्ञान में विशेष न होने पर भी प्रतियोगिज्ञानरूप सहकारी की अपेक्षा से विचित्र व्यवहार की उपपत्ति होती है । खण्डन—‘घटः’ इत्याकारक तथा ‘पटाद् भिन्नः घटः’ इत्याकारक दो प्रकार के व्यवहार होते हैं । उन व्यवहारों की सत्यता के लिए वास्तविक अर्थगत विशेष अवश्य मानना होगा । यदि उसे न मानें, तो दोनों में से एक व्यवहार असत्य हो जायगा । यदि अर्थगत विशेष को मान लें, तो वही भेद हो जायगा, घटत्वादि को भेद मानना व्यर्थ है । यदि भेद को अनन्त मानें, तो वह भेद-परम्परा क्रमशः ज्ञेय है या एककाल में ? यदि क्रमशः ज्ञेय मानें, तो भेद अनन्त होने से भेद-प्रतीति की समाप्ति ही नहीं होगी । यदि एक ही काल में सभी भेदों का ज्ञान मानें, तो सभी भेदों के सदृश होने से ‘किससे कौन भिन्न है, यह इससे भिन्न है या नहीं ?’ इस तरह सर्वत्र सन्देह-विपर्यय होने लगेंगे । फलतः प्रामाण्य में अविश्वास हो जायगा । समर्थन—तीन या चार भेदों का ग्रहण होता है । भेद-परम्परा का ग्रहण नहीं होता । खण्डन—ऐसा मानने पर जिस भेद का ग्रहण न हुआ, उसका स्वाश्रय से अभेद होने पर मूलपर्यन्त अभेद हो जाने से भेद का अत्यन्त अभाव हो जायगा ।