खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] भेद-लक्षण का खण्डन ४८१ पेक्षामन्तरेण घटत्वप्रतीत्यनुपपत्तिप्रसङ्गः । नहि यदन्तरेण यदुत्पद्यते तत्तत्कारणं नाम ? वह्नाविवावान्तरजातिभेदे कारणभेदस्य चरितार्थयितुमशक्यत्वात् । साक्षा- त्कारित्वादिना सह परापरभावानुपपत्तेः । जात्योः परापरत्वसङ्करमिच्छतामपि मते पञ्चम्यर्थावधिभावः प्रतिपाद्यमानः केन सममन्वियात् । घटत्वस्यावधिघटितत्वे तथैव परं प्रतीत्यापत्तेः । बिना घटत्वादि की प्रतीति होती है, उस काल में घटत्वादि-व्यवहार होता है । खण्डन—प्रतीति में किसे पटादि की अपेक्षा है, यह कहना होगा, क्या घटत्वादि को या घटत्वादिनिष्ठ किसी धर्म को ? आद्यपक्ष में पटादि की अपेक्षा के बिना घटत्वादि की कदाचित् भी प्रतीति नहीं होगी, पर वह होती है। फिर पटादि की अपेक्षा के बिना भी यदि घटत्वादि की प्रतीति को आप मानें, तो घटत्वादि में पटादि की अपेक्षा कारण ही नहीं रही, क्योंकि जिसकी अपेक्षा के बिना जो उत्पन्न होता है, उसमें वह कारण नहीं होता । समर्थन—वह घटत्वज्ञान विलक्षण है, जिसमें पटादि की अपेक्षा है । अतः जैसे वह्नि में विलक्षण जाति मानकर तृण, अरणि और मणि की कारणता व्यभिचरित नहीं होती, वैसे ही घटत्वज्ञान में भी दो जातियाँ मानने पर पटादि की अपेक्षा का व्यभिचार नहीं होगा । खण्डन --वह्नि में तृणादि-कारणता प्रत्यक्ष है, अतः वहाँ विलक्षण जाति को मानकर व्यभिचार का निवारण उचित ही है । किन्तु यहाँ घटत्वज्ञान में पटादिकी अपेक्षा प्रत्यक्ष नहीं है, अतः उससे ज्ञानगत विलक्षण जाति की कल्पना युक्त नहीं है । किञ्च—प्रत्यक्षत्व जाति पटादि-ज्ञान में भी है और वहाँ घटत्व-ज्ञानत्व नहीं है, घटत्व-ज्ञानत्व अनुमित्यात्मक घटत्व-ज्ञान में भी है, वहाँ प्रत्यक्षत्व नहीं है और दोनों प्रत्यक्षात्मक घटत्व-ज्ञान में है, अतः सङ्कर दोष होने से घटत्व-ज्ञानत्व जाति नहीं हो सकती । किञ्च—सङ्कर होने पर भी घटत्व-ज्ञानत्व को जाति मान लें, तो भी 'पटात्' इस पंचमी से उक्त अवधित्व का कहाँ अन्वय होगा ? घटत्व तो अवधि में साकांक्ष है नहीं । यदि उसे अवधि में साकांक्ष मानें, तो सर्वदा अवधि की अपेक्षा से घटित ही घटत्वादि की प्रतीति होने लगेगी । ६१