खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] तर्क-सामान्य-लक्षण का खण्डन ५४३ तर्क-सामान्य-लक्षण-खण्डनम् भावाभावयोर्विरोधानभ्युपगमे तवाप्यनिष्टापत्तिरिति चेत्; केयमापत्तिः ? तर्कभेद इति चेत् ; अथ कस्तर्कः ? अभ्युपगतव्याप्यं प्रति व्यापकप्रसञ्जनं सः। तत्प्रसञ्जनं च स्वीकारार्हता- बोधनमिति चेन्न । अव्याप्तेः। अस्ति ह्यप्रसङ्गोऽपि सम्भावना नाम तर्कः। तद्यथा - 'यदि जलं सहकारिभिः सम्पत्स्यते तदा मे तृषं शमयिष्यती'ति; इष्टापादनेऽपि गतत्वाच्च। अनभ्युपगतव्यापकमित्यपीति चेन्न । तथाभूतमपि प्रत्यव्याप्यादव्यापकप्रस- ञ्जने गतत्वात् । व्याप्येनेत्यपि कार्यमिति चेन्न। विकल्पासहत्वात्—किं तर्क-सामान्य-लक्षण का खण्डन यदि कहें कि “इस तरह भाव और अभाव का विरोध ही न मानें, तो आप पर भी अनिष्ट की आपत्ति हो जायगी। अर्थात् अद्वैत से द्वैत का प्रतिक्षेप नहीं होगा; क्योंकि इनमें विरोध ही न रहा” तो कहिये, आपत्ति ही क्या वस्तु है ? यदि तर्कभेद (तर्कविशेष) है, तो वह तर्क ही क्या वस्तु है ? निर्वचन—‘जो व्याप्य का स्वीकार किये हों, उनके प्रति व्यापक का प्रसञ्जन तर्क है।’ व्यापक की स्वीकारार्हता का बोधन ही व्यापक का प्रसञ्जन है। खंडन—इस लक्षण की 'यदि जल सहकारी से सम्पन्न ( पीत ) हो, तो मेरी पिपासा की निवृत्ति करेगा' इस सम्भावनारूप तर्क में अव्याप्ति हो जायगी। यदि कहें कि प्रसङ्गरूप तर्क का ही यह लक्षण है, सम्भावनात्मक तर्क का नहीं, अतः सम्भावना के लक्ष्य ही न होने से उसमें लक्षण का न जाना अव्याप्ति नहीं है, तो जहाँ व्यापक वह्नि इष्ट ( प्रथम से सिद्ध ) है, वहां 'यदि धूम है, तो वह्नि अवश्य है' आदि इष्टापादनरूप तर्काभास-स्थल में अतिव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—‘जो व्याप्य का स्वीकार करे और व्यापक का स्वीकार न करता हो, ऐसे पुरुष के प्रति व्यापक का प्रसञ्जन तर्क है।' खण्डन—उस पुरुष के प्रति भी 'यदि इन्धन है, तो वह्नि अवश्य है' इस स्थल में, जहां अव्याप्य से व्यापक का प्रसञ्जन है, अतिव्याप्ति हो जायगी। समर्थन—लक्षण में 'व्याप्य से व्यापक का प्रसञ्जन तर्क है' यह भी निवेश