खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५४४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ परमार्थतो व्याप्यव्यापकभावव्यवस्थितयोः स्वरूपेणेष्टानिष्टत्वम्, उत व्याप्य- व्यापकयोर्भावेन तत् ? नाद्यः ; तथात्वाज्ञातेन वैपरीत्येनेष्टेनापि प्रसञ्जने प्रसङ्गात् । अन्यथा परै- स्तथात्वेनानङ्गीकृतेन स्वयमपि परान्प्रति तथात्वेन व्युत्पादयितुमशक्तेन परमार्थत- स्तथाभूतेन प्रसञ्जने जयप्रसङ्गात् । न द्वितीयः ; स्वयमपि तथेष्टानिष्टतायां सत्यां कृते तादृशि प्रसङ्गे 'यत्रोभयो- रि'त्यादिना दोषेण सत्प्रसङ्गतया अनिष्टेऽपि गततयाऽतिव्यापकत्वात् । कर देंगे, तो उक्त स्थल में अतिव्याप्ति नहीं होगी। खंडन—यह लक्षण भी विकल्प सहने में असमर्थ होने से अयुक्त है। देखिये—क्या जिनमें वस्तुसत् व्याप्यव्यापकभाव हो, उनका स्वरूपतः अभ्युपगम-अनभ्युपगम लक्षण का घटक है अथवा व्याप्यत्व से और व्यापकत्वरूप से अभ्युपगम-अनभ्युपगम लक्षण में प्रविष्ट है ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, कारण जहाँ धूम और वह्नि का वस्तुतः विद्यमान भी व्याप्य-व्यापकभाव ज्ञात न हो, वहाँ भी धूम से वह्नि का प्रसञ्जन तर्क हो जायगा। अर्थात् वहाँ अन्यतर के प्रति व्याप्ति सिद्ध न होने से शिथिल-मूल होने के कारण वास्तव में वह तर्काभास ही है, तर्क नहीं। अतः उक्त स्थल में अतिव्याप्ति हो जायगी। किञ्च— जहां धूम में ही व्यापकत्व तथा वह्नि में व्याप्यत्व का भ्रम है, वहां भी वस्तुतः धूम व्याप्य होने से धूम के अभ्युगम से वह्नि का प्रसञ्जन तर्क हो जायगा। यदि आपाद्यनिरूपित व्याप्ति आपादक में न मानकर वस्तुभूत ही व्याप्यत्व-व्यापकत्व को प्रसङ्ग का मूल मानें, तो जहां वादी व्याप्यव्यापकभाव नहीं मानता और उसके सामने स्वयं ( प्रतिवादी ) भी व्याप्यव्यापकभाव का प्रतिपादन नहीं कर सकता, पर वस्तुतः व्याप्यव्यापकभाव है, वहां भी व्याप्य से व्यापक के प्रसङ्ग द्वारा प्रतिवादी की विजय हो जानी चाहिए। किन्तु होती है पराजय ही। द्वितीय कल्प भी युक्त नहीं है; कारण जहाँ वादी के तुल्य प्रतिवादी स्वयं भी व्याप्य का अभ्युपगम और व्यापक का अनभ्युपगम करता हो, वहां 'यदि सत्ता सद्- व्यवहारविषय हो, तो सत्तावती हो जायगी' इस प्रसङ्ग में अतिव्याप्ति हो जायगी। स्वमत में भी सत्ता में सत्ता का अस्तित्व अनिष्ट होने से यह तर्काभास है, तर्क नहीं है। कारण 'यत्रोभयोः समो दोषः' इस न्याय के अनुसार जो दोष दोनों मतों में है, उसका एक मत में आपादन नहीं कर सकते।