खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] तर्क-सामान्यलक्षण का खण्डन ५४५ स्वयं व्याप्यतयाऽनिष्टेनेत्यपि विशेषणीयमिति चेन्न । स्वयमपि व्याप्य- तयेष्टेन स्वमात्रेष्टव्यापके विषये प्रसङ्गस्याव्यापनात् । अथ स्वयमनिष्टव्यापके स्वयं व्याप्यतयेष्टेन यन्न भवति, तत्रानभ्युपगत- व्यापकं परं प्रति पराभ्युपगतेन व्याप्येन व्यापकप्रसञ्जनं तर्कः । एवं सति हि स्वानिष्टव्यापके स्वयमिष्टव्याप्येन यत्र प्रसङ्गस्तत्र गमनादतिव्याप्तिर्या, या च स्वमात्रेष्टव्यापके स्वयमपि व्याप्यतयेष्टेन प्रसङ्गस्याव्याप्तिस्ते निरस्ते भवत इति चेन्न । 'यद्यत्र सत्ताऽपि घटोऽभविष्यत्तदाऽद्रक्ष्यदि'त्याद्यव्यापनात् । तत्र स्वयम- समर्थन—'जो पुरुष व्याप्य का स्वीकार करता हो और वही व्यापक का अस्वीकार करता हो, उसके प्रति स्व द्वारा अस्वीकृत व्याप्य से व्यापक का प्रसञ्जन तर्क है ।' यदि सत्ता सद्व्यवहार-विषय हो, तो सत्तावती हो जायगी' इस स्थल में सत्ता में सद्- व्यवहार-विषयत्वरूप व्याप्य स्व द्वारा इष्ट ही है, अनिष्ट नहीं। अतः वहाँ अतिव्याप्ति नहीं है । खंडन—जहाँ नैयायिक स्व द्वारा व्याप्यत्वरूप से इष्ट प्रमेयत्व से स्वमात्र द्वारा [ ईश्वरादि प्रत्यक्षविषय होने से ] इष्ट प्रत्यक्षरूप व्यापक का मीमांसक के प्रति 'यदि अदृष्ट प्रमेय हो, तो प्रत्यक्ष हो जायगा' इस प्रकार प्रसञ्जन करता हो, वहां अव्याप्ति हो जायगी । कारण उक्त स्थल में व्याप्य स्व द्वारा अनिष्ट नहीं है, अतः उक्त लक्षण का समन्वय नहीं होता । समर्थन—'स्व से अनिष्ट व्यापक का स्व से इष्ट व्याप्य द्वारा जो प्रसञ्जन है, उससे भिन्न ( अर्थात् अनभ्युपगत है व्यापक जिस पुरुष से, उसके प्रति पर द्वारा अभ्युपगत व्याप्य से व्यापक का ) प्रसञ्जन तर्क है । ऐसा लक्षण करने पर 'यदि सत्ता सद्व्यवहार-विषय हो, तो सत्तावती हो जायगी' इस असत्-प्रसङ्ग में स्व से भी अनिष्ट व्यापक का स्व से इष्ट व्याप्य द्वारा प्रसङ्ग होने से तद्भिन्नत्व न होने के कारण अतिव्याप्ति नहीं होगी । 'स्व द्वारा अस्वीकृत व्याप्य से' यह निवेश न होने के कारण 'यदि अदृष्ट प्रमेय हो तो प्रत्यक्ष हो जायगा' इस सत्प्रसङ्ग में अव्याप्ति भी नहीं होगी । कारण नैयायिक ( स्व ) द्वारा अदृष्ट में प्रत्यक्षत्व ( व्यापक ) इष्ट होने से भिन्नान्त लक्षण भी समन्वित हो जायगा । खण्डन—'यदि यहां घट विद्यमान होता तो दीखता' इस प्रसङ्ग में अव्याप्ति हो जायगी, कारण यहां स्व से इष्ट : ६६