भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

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५४६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ निष्ठदर्शनरूपव्यापके स्वयं व्याप्यतयेष्टेनैव हि दर्शनयोग्येन घटसत्त्वेनासौ प्रसङ्गः । अथ तत्र सत्त्याऽपि स्वयमनिष्टेनेति निषेध्यकोटौ प्रविश्य निषेधोऽभिधी- यते--एवं यत्र भवतीति । तदपि न ; एवम्भूते एव विपर्ययापर्यवसायिनि गततयाऽतिव्यापकत्वात् । विपर्ययपर्यवसायिनेत्यपि प्रक्षेप्यमिति चेन्न । केवलपरपक्षदूषणाय पर- मात्राभ्युपगम्यमानव्याप्यत्वेन एवंक्षमस्य परं प्रति व्यापकप्रसञ्जनस्याव्यापनात् । तत्र स्वयं व्याप्त्यनभ्युपगमेन विपर्ययपर्यवसायित्वासम्भवात् । स प्रसङ्ग एव न भवति, विरोधमात्रं तदिति चेन्न । अनिष्टं व्याप्याभ्युप- गमबलेन परं प्रत्यापाद्यत इत्येवम्भूतस्यार्थस्य उभयत्रापि तुल्यत्वात् । तुल्यत्वेऽपि सत्त्वरूप व्याप्य द्वारा ही स्व से अनिष्ट दर्शनरूप व्यापक का प्रसञ्जन होने से भिन्नान्त लक्षणभाग समन्वित नहीं होता । समर्थन--'स्व से अनिष्ट व्यापक का स्व द्वारा सत्त्वरूप से तथा व्याप्य- त्वरूप से जो इष्ट हो, उससे जो प्रसञ्जन, उससे भिन्नत्व' ऐसा लक्षण में निवेश करने पर उक्त स्थल में अव्याप्ति नहीं होगी । कारण उक्त स्थल में स्व द्वारा सत्त्वरूप से घट इष्ट न होने से भिन्नान्त का समन्वय नहीं होता । खण्डन--ऐसा निवेश करने पर 'यदि ब्रह्म वेदैकमम्य हो, तो अग्निहोत्र के तुल्य अस्वप्रकाश हो जायगा' इस विपर्यय-अपर्यवसानी असत्प्रसङ्ग में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन--उक्त लक्षण के विशेष्य दल में 'विपर्यय-पर्यवसायी' यह विशेषण देने पर उक्त अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन--उक्त विशेषण देने पर केवल परपक्ष के दूषण के लिए परमात्र द्वारा अभ्युपगम्यमान व्याप्य से परपक्ष के दूषण में क्षम व्यापक का पर के प्रति जो प्रसञ्जन होगा, उसमें अव्याप्ति हो जायगी । अर्थात् 'यदि ब्रह्म को जगत् का उपादान मानें, तो मिट्टी के तुल्य वह भी विकारी हो जायगा' इस सत्प्रसङ्ग में अव्याप्ति हो जायगी । कारण नैयायिक के मत में निर्विकार आकाश शब्द का उपादान होने से यहां विपर्यय में पर्यवसान नहीं है । समर्थन--'यदि ब्रह्म को उपादान मानें, तो वह विकारी हो जायगा' ऐसा प्रसञ्जन तर्क ही नहीं है, कारण जिस प्रसंग ( तर्क ) का विपर्यय में पर्यवसान न हो, उसे हम प्रसंग ही नहीं मानते । उक्त स्थल में 'उपादानत्वरूप व्याप्य ब्रह्म में है, तो व्यापक विकारित्व के न होने में विरोध होगा' इस तरह हम केवल विरोध का