खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 569, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] तर्क-सामान्यलक्षण का खण्डन ५४७ लक्षणकरणासामर्थ्याद्यदि विपर्ययपर्यवसायिन्येव प्रसङ्गत्वं त्वया परिभाष्येत, तर्हि मया परबाधमात्र एव प्रसङ्गतायाः, विपर्ययपर्यवसायिनि तु तत्र विरोधतायाः परिभाषितुं शक्यत्वात् ! अन्यथा विरोधत्वमेवोभयोरपि स्यात् । प्रत्यवस्थानवैचित्री चेत्तत्र विरोधाद्विशेषः, साऽत्रापि तुल्यैव । अत एव सम्भावनाऽपि तर्कादिन्यैवेति निरस्तम् ; आरोपादपि व्याप्यता- निमित्तव्यापकाभ्युपगमाविशेषात् । अत एव परप्रमितेनेति विशिष्य परानिष्टापादनमात्ररूपविपर्ययापर्यव- उद्भावन ही करते हैं । एवञ्च वहाँ अव्याप्ति ही कहाँ है ? खंडन—व्याप्य के अभ्युपगम के बल पर पर के प्रति अनिष्ट ( व्यापक ) का आपादनरूप अर्थ तो दोनों स्थलों में तुल्य ही है । इस प्रकार तुल्य-प्रसङ्ग होने पर भी लक्षण करने में असमर्थ होने के कारण यदि आप केवल विपर्ययपर्यवसायी स्थल में ही प्रसङ्गत्व का व्यवस्थापन करें, तो हम भी ऐसी परिभाषा ( संकेत ) कर सकते हैं कि जहां 'केवल परपक्ष का बाध है, वहीं प्रसङ्गत्व है और जहाँ विपर्यय में पर्यवसान हो, वहां विरोध है ।' यदि हमारी यह परिभाषा न मानें, तो [ विशेष न होने से ] दोनों स्थलों में विरोध ही मानिये । यदि कहें कि वहाँ की अपेक्षा विपर्यय में पर्यवसानरूप विरोध विशेष है, तो हम भी कह सकते हैं कि पराभ्युपगत व्याप्य से अनिष्ट व्यापक का प्रसञ्जन दोनों स्थलों में तुल्य होने से उक्त वैचित्र्य अकिञ्चित्कर है । अतएव “यदि जल सहकारी से सम्पन्न हो, तो तृषा की शान्ति करे' यह सम्भावना प्रसङ्गरूप न होने से तर्क नहीं है,” यह कथन भी युक्त नहीं है । कारण सम्भावना प्रसंगरूप न होकर आरोपरूप होने पर भी व्याप्य के अभ्युपगम से व्यापक के अभ्युपगम में दोनों स्थलों में कोई विशेष नहीं है । इसीलिए 'पराभ्युपगत व्याप्य से' इसके स्थान पर 'परप्रमित व्याप्य' ऐसा निवेश कर जहाँ पर के प्रति अनिष्ट का आपादन है, परन्तु विपर्यय में पर्यवसान नहीं है, वहां तर्कलक्षण की अतिव्याप्ति का निरास करना चाहिए' यह कथन भी अयुक्त है । कारण जहां विपर्यय में अपर्यवसान है, वहाँ परमार्थतः व्याप्ति न होने पर भी