खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] तर्क-सामान्यलक्षण का खण्डनं ५४६ सौगतानां सत्त्वक्षणिकत्वव्याप्तिसाधकविपर्ययान्यथाभावदण्डप्रसङ्गवत् । तामन्त- रेण तस्य स्वपक्षसाधनाक्षमत्वात् , तस्य च व्याप्तिवास्तवत्वमपि मन्तव्यम् । अन्यथा विपर्ययेऽपि व्याप्त्यभावेन स्वपक्षसाधनाक्षमत्वादेव । यस्तु प्रसङ्गः परपक्षबाधनाङ्गं तत्र पराभ्युपगममात्रं प्रयोजकम् । तावतैव परपक्षप्रतिक्षेपक्षमत्वेन वास्तवव्याप्तिविपर्ययपर्यवसानपर्यन्तानुसारित्वादिति युक्तं पश्यामः । तथाच सति कथितलक्षणासङ्गतिस्तदवस्थैव । अथ व्याप्याभ्युपगमेनानिष्टस्य व्यापकस्य प्रतीतिस्तर्कइति चेन्न । इष्टार्थसम्भा- वनायामव्याप्तेः । तेन व्यापकस्य प्रतीतिः स इति चेन्न । इष्टापादनेऽपि गतत्वात् । अप्रमितस्य तथेति चेन्न । प्रथमानुमानेऽपि गतत्वात् । अनुमाने व्याप्यस्य उसके बाधन के लिए 'यदि क्षणिकत्व न हो, तो सत्त्व भी नहीं रहेगा' ऐसा प्रसङ्ग उपन्यस्त होता है । जबतक विपर्यय में पर्यवसान न हो, तबतक वह प्रसङ्ग स्वपक्ष- साधन में समर्थ ही नहीं हो सकता । इसी तरह वहां वास्तव व्याप्ति भी माननी चाहिए, अन्यथा विपर्यय में भी व्याप्ति न होने से वह स्वपक्ष का साधक नहीं होगा । एवञ्च जो प्रसङ्ग परपक्ष के बाधन के कारण हैं, उनमें पराभ्युपगममात्र प्रयोजक है । क्योंकि पर के अभ्युपगममात्र से ही परपक्ष का खण्डन हो जाने के कारण वास्तविक व्याप्ति और विपर्ययपर्यवसान तक अनुसरण करने में कुछ भी फल न होने से व्याप्ति आदि का अननुसरण ही हमें उचित दीखता है । ऐसा मानने पर यदि तर्कलक्षण में 'विपर्ययपर्यवसायी' यह विशेषण दें, तो 'यदि ब्रह्म उपादान हो तो विकारी हो जायगा' इस स्थल में, जहाँ विपर्यय में पर्यवसान नहीं है, अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'व्याप्य के अभ्युपगम से अनिष्ट व्यापक की प्रतीति तर्क है' ऐसा कहेंगे । खण्डन—'यदि जल सहकारी से सम्पन्न हो, तो तृषा की शान्ति करे' यहाँ अव्याप्ति हो जायगी । यदि 'अनिष्ट' विशेषण न दें, तो भी जहाँ इष्ट वह्नि का धूम से आपादान है, वहाँ अतिव्याप्ति हो जायगी । । समर्थन—'व्याप्य के अभ्युपगम से अप्रमित व्यापक की प्रतीति तर्क है' ऐसा लक्षण करेंगे । खण्डन—धूम से वह्नि की प्रथम अनुमिति में अतिव्याप्ति हो जायगी; कारण वह्नि अनुमिति से पूर्व अप्रमित ही है । समर्थन—अनुमान-स्थल में धूम की प्रमा से वह्नि की अनुमिति होती है, अभ्यु- पगम से नहीं । लक्षण में तो अभ्युपगम का निवेश है, अतः वहाँ अतिव्याप्ति नहीं