भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 572

५५० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्यं [ चतुर्थ प्रमया तथा, न त्वभ्युपगमेनेति चेन्न । वस्तुगत्या व्याप्यस्य प्रमयाऽपि प्रतिवाद्य- सिद्धस्य व्यापकानुमानासम्भवेन तत्राप्यभ्युपगमपर्यन्तं गन्तव्यत्वादेव । नन्वेवमन्यतरासिद्धं व्याप्यं प्रसाध्य अनुमानव्यवस्थापनमुच्छिन्नम् । तदप्रसा- धनेऽन्यतरासिद्ध्या, तत्प्रसाधने परस्याभ्युपगन्तुरपसिद्धान्तात् । अपसिद्धान्तमनु- द्भाव्य वादिना प्रसाधितात् व्याप्यात् व्यापकसाधने पर्यनुयोज्योपेक्षणादिति । किं तत्र तथा न स्यात्, किमत्राप्रस्तुतया तच्चिन्तया ? अन्यतरासिद्धस्य तावद्व्याप्यस्याभ्युपगमं परेणाकारयित्वैव न व्यापकसाधनमुपेयम् । तस्याप्रमा स इति चेन्न । मिथोविरुद्धादौ तर्काभासेऽपि गतत्वात् । आश्रया- सिद्ध्यादिव्यतिरेके सतीति चेन्न । सन्दिग्धधूमदर्शनात् । यद्यत्र धूमस्तदाऽग्नि- होगी । खंडन— वस्तुतः जहाँ व्याप्ति की प्रमा तो है; परन्तु प्रतिवादी व्याप्य का अभ्यु- पगम नहीं करता, वहाँ अनुमान नहीं होता । अतः अनुमिति में भी व्याप्य के अभ्युपगम को कारण मानना ही होगा । एवञ्च पूर्वोक्त अतिव्याप्ति तदवस्थ ही है । • समर्थन—यदि अनुमिति में व्याप्ति के अभ्युपगम को कारण मानें, तो अन्यतर के प्रति असिद्ध व्याप्य का प्रसाधनकर अनुमिति-साधन की प्रक्रिया का ही उच्छेद हो जायगा । कारण यदि व्याप्य का साधन न करें, तो उसकी अन्यतर के प्रति असिद्धि होने से अनुमिति नहीं होगी । यदि साधन करें, तो पर के लिए व्याप्य के अभ्युपगम से अपसिद्धान्त हो जायगा । उक्त अपसिद्धान्त का उद्भावन न करने पर 'वादि द्वारा साधित व्याप्य से व्यापक के साधन में पर्यनुयोज्य अपसिद्धान्त की उपेक्षारूप निग्रह हो जायगा । खंडन— अन्यतरासिद्ध व्याप्य-स्थल में उक्त प्रकार से अनुमान का उच्छेद निश्चित है । किन्तु उस अप्रस्तुत की चिन्ता से यहाँ क्या लाभ है ? अन्यतर के प्रति असिद्ध व्याप्य का अभ्युपगम बिना कराये व्यापक का साधन स्वीकार्तव्य नहीं है । अतः उस अनुमिति में तर्कलक्षण की अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'व्याप्य के अभ्युपगम से अप्रमित व्यापक की अप्रमा तर्क है।' खण्डन—मिथो-विरुद्ध आदि तर्काभासों में अतिव्याप्ति हो जायगी । अर्थात् 'यदि शुक्तिरूप्य प्रतीयमान हो, तो वह सत् हो जायगा' और 'सत् होने पर भी यदि