खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] तर्क-सामान्यलक्षण का खण्डन ५५१ मानिति सम्भावनायाः परमार्थतस्तथार्थावस्थानात् । प्रमात्वं त्यक्तुमपारयन्त्या अव्यापनात् । तत्कालं प्रमात्वेनाप्रमीयमाण इत्यपीति चेन्न । बहुशो दत्तोत्तरत्वात् । सर्वस्य चास्य पूर्वोक्तोभयानिष्टव्यापकेष्टव्याप्योदाहरणे गतत्वेनातिव्यापकत्वात् । तद्व्यवच्छेदार्थमारोपितस्य व्याप्यस्याभ्युपगमेनेति करणे च सिद्धेन उसका बाध मानें, तो असत् हो जायगा' इस सत् और असत् के परस्पर विरोधरूप तर्काभास में अतिव्याप्ति हो जायगी' । समर्थन—लक्षण में 'आश्रयासिद्धादिभिन्नत्व ( मिथोविरुद्धानि-भिन्नत्व ) का निवेश करने पर उक्त स्थल में अतिव्याप्ति नहीं होगी । खण्डन— संदिग्ध धूम-दर्शन से जहाँ 'यदि वहाँ धूम है तो अग्नि भी है' ऐसी सम्भावना होती है, वस्तुतः वह्नि होने से प्रमारूप उस सम्भावना में अव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'व्याप्य के अभ्युपगम से व्यापक की उस काल में प्रमात्वरूप से अप्रमी- यमाण प्रतीति तर्क है' ऐसा कहेंगे। खंडन—यह लक्षण भी 'तत्-शब्दघटित होने से अननुगत हो जायगा । इसी तरह 'वादी द्वारा प्रमितत्वरूप से अप्रमीयमाण है या प्रतिवादी द्वारा ?' इस विकल्प से कवलित होने से भी यह लक्षण असङ्गत है । किञ्च—जहाँ सत्ता में दोनों के व्यापक ( सत्ता ) अनिष्ट हैं और व्याप्य इष्ट हैं, वहां 'यदि सत्ता सद्द्व्यवहारविषय हो, तो सत्तावती हो जायगी' इस असत्प्रसङ्ग में अतिव्याप्ति हो जायगी । समर्थन—'आरोपित व्याप्य के अभ्युपगम से व्यापक की प्रतीति तर्क है' ऐसा कहेंगे । उक्त स्थल में व्याप्य का आरोप नहीं, किन्तु विद्यमानता है; अतः अति- 'मिथोविरुद्धादौ' का सदसद् के परस्पर विरोधरूप तर्काभास, यह अर्थ 'विद्यासागरी' का है । 'शारदाकार लिखते हैं कि "शब्दो यदि अनित्यो न स्यात्, कृतको न स्यात्' और 'शब्दो यदि नित्यो न स्यात्, श्रावणो न स्यात्' ये दोनों जो सत्प्रतिपक्ष की तरह परस्पर विरुद्ध तर्काभास हैं, उनमें अतिव्याप्ति हो जायगी । परस्पर परामर्शो का प्रतिबन्ध होने से इनकी फलभूत अनुमितियों के न होने पर भी उक्त तर्काभासों के होने में कोई बाधक नहीं है । विपर्ययापर्यवसायी तर्क- विशेष का संग्रह करने के लिए आप वस्तुसत् व्याप्ति की विवक्षा कर ही नहीं सकते, अतः इसका अभाव कहकर इस अतिव्याप्ति का वारण नहीं हो सकता।" 'मिथोविरुद्धादौ' यहाँ आदिपद से आश्रयासिध्यादि का ग्रहण है । अतएव 'आश्रयासिद्धादिभ्यतिरेके सति' यह कहना संगत है ।