खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५२ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ- व्याप्येन प्रसङ्गस्याव्यापनात् । तद्यथा—कार्यत्वात् यद्यदृष्टसृष्टमङ्कुरादि मीमांसकः शंसति, तदानीमविशेषेण कर्तृकार्यमपि पर्यवस्येदस्य तदिति । अपिच—आत्माश्रयोऽन्योन्याश्रयश्चक्रकं व्याघातोऽनवस्था प्रतिबन्दी चेत्यापाद्यैर्भिद्यमाना षट्तर्कीष्यते । स्वरूपं चैषां स्वस्याव्यवहितस्वापेक्षण- मात्माश्रयः, अन्योन्यस्याऽव्यवहितान्योन्यापेक्षित्त्वमन्योन्याश्रयः, अन्तरितस्य तदेव द्वयमात्माश्रयोऽन्योन्याश्रयश्चक्रकम्, विरुद्धसमुच्चयो व्याघातः, उपपाद्योपपादकप्रवाहोऽनवधिरनवस्था, स्वाभ्युपगतदोषतुल्यता प्रतिबन्दी । तत्र आत्माश्रयस्य सम्बन्धद्वारभेदादाभासत्वम् । यथा प्रमेयत्वस्याऽऽत्मनि वृत्तौ । क्वचिन्नैवमपि । यथा—अनेककालस्थस्य घटस्य पूर्वकालवृत्त्यात्मन उत्तरकालवृत्त्यात्मानं प्रति कारणत्वे । व्याप्ति नहीं होगी । खण्डन—यदि उक्त लक्षण में आरोपितत्व व्यापक विशेषण दें, तो जहाँ मीमांसक के प्रति नैयायिक अङ्कुरादि में विद्यमान 'कार्यत्व' रूप व्याप्य से 'कर्तृसृष्टत्व' रूप व्यापक का प्रसङ्ग करता है, अर्थात् 'यदि अंकुरादि कार्य हैं तो अदृष्ट- सृष्ट के तुल्य कर्तृजन्य भी हैं' ऐसा तर्क करता है, तो उसमें अव्याप्ति हो जायगी । किञ्च—आपाद्य के भेद से तर्क छः प्रकार के माने गये हैं । यथा—आत्मा- श्रय, अन्योन्याश्रय, चक्रक, व्याघात, अनवस्था और प्रतिबन्दी । इनके लक्षण क्रमशः इस प्रकार हैं—अपने ज्ञान के लिए जहाँ अव्यवहित पूर्वक्षण में अपने ज्ञान की अपेक्षा हो, वह आत्माश्रय है । अन्योन्याश्रय अन्योन्य द्वारा अव्यवधान से अन्योन्य की अपेक्षा- रूप है । व्यवधान से स्व के द्वारा स्व की अपेक्षा या व्यवधान से अन्योन्य द्वारा अन्योन्य की अपेक्षा चक्रक है। विरुद्ध दो धर्मों का एक धर्मी में समुच्चय व्याघात है । अवधि से रहित उपपाद्य-उपपादक का प्रवाह अनवस्था है । एक पक्ष द्वारा दिये गये दोष की अपर पक्ष में तुल्यता प्रतिबन्दी है । इनमें आत्माश्रय-दोष सम्बन्धरूप व्यापार के भेद से आभास है । जैसे— प्रमेयत्व में प्रमेयत्व के रहने से । अर्थात् घट में प्रमेयत्व घटत्वप्रकारक-प्रमाविषय- त्वरूप है और प्रमेय में प्रमेयत्वप्रकारक-प्रमाविषयत्वरूप है; अतः घटप्रमा और प्रमेयत्व- प्रकारकप्रमारूप ज्ञानों के भेद होने से आत्माश्रय दोष नहीं होता । कहीं-कहीं आत्माश्रय आभास नहीं, प्रत्युत दोष ही होता है । जैसे—'अनेककालवृत्तिर्घटः' इत्याकारक ज्ञान- काल में उत्तरकालवृत्ति घटज्ञान के प्रति पूर्वकालवृत्ति घटज्ञान कारण होने से वहाँ आत्माश्रय दोष ही है ।