भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 575

परिच्छेद ] तर्कसामान्यलक्षण का खण्डन ५५३ अन्योन्याश्रयस्य व्यक्तिभेदात् । यथा—ज्ञानेन संस्कारस्य, तेन च ज्ञानस्य जनने । चक्रकस्यापि तस्मात् । यथा—बीजेनाऽङ्कुरस्तेन स्तम्बः, तेन बीजं जन्यत इत्यत्र । व्याघातस्य उपाधिभेदात् । यथा—कालभेदादिना जननाजननादौ । अनवस्थायाः क्रियायै परस्परानन्त्यानपेक्षणात् । यथा—सामग्र्या कार्य- जननाय स्वसामग्र्यानन्त्यानपेक्षणे । तामेतामधोधावन्तीमनवस्थामाचक्षते । क्वचिन्नेवमपि । यथा—स्वाश्रये भिन्नबुद्धिजननाय स्वगतभेदानुपजीवनादपि व्यक्ति-भेद से अन्योन्याश्रय भी कहीं-कहीं आभास होता है । जैसे—ज्ञान से संस्कार और संस्कार से ज्ञान की उत्पत्ति में । यहां संस्कार अनुभव- रूप ज्ञान से उत्पन्न होता और स्मरणरूप ज्ञान को उत्पन्न करता है; अतः अनुभव और स्मृतिरूप व्यक्तियों के भेद से अन्योन्याश्रय दोष नहीं, आभास ही हैं। चक्रक भी व्यक्ति-भेद से आभास होता है। जैसे—बीज से अंकुर और अंकुर से स्तम्ब और स्तम्ब से बीज की उत्पत्ति में। यहां बीजरूप व्यक्तियों का भेद है। व्याघात भी देश-कालरूप निमित्त-भेद से आभास होता है। जैसे—कुसूल (कोठिला) में स्थित बीज में अजनकत्व और क्षेत्रस्थ बीज में जनकत्वरूप विरुद्ध दो धर्म देश और काल-भेद से रहते हैं। अतः ऐसे स्थलों में व्याघात आभास है। जहाँ कार्योत्पत्ति में परस्पर आनन्त्य की अपेक्षा नहीं होती, वहाँ अनवस्था आभास होती है। जैसे—कार्य सामग्री से और वह सामग्री भी अपनी सामग्री से ही उत्पन्न होती है; कारण वह कादाचित्क है और जो कादाचित्क होता है, वह जन्य होता है। इस प्रकार एक से एक के जन्य होने से कार्य-कारण की अन- वधि धारा होने पर भी कार्योत्पत्ति में कार्य की सामग्री को अपनी सामग्री की अपेक्षा न होने से यह अनवस्था आभास है। कारण कार्योत्पत्ति में सामग्री की सामग्री अन्यथा- सिद्ध हुआ करती है। पण्डित लोग इस अनवस्था को नीचे की ओर दौड़नेवाली अनवस्था कहते हैं। कहीं अनवस्था आभास नहीं भी होती। जैसे—घट और घटभेद में भिन्नत्व-व्यवहार का साम्य होने पर भी घट में भिन्नत्व-बुद्धि के लिए १. कुसूलस्थ बीज में स्वरूपयोग्यातारूप कारणत्व होने पर भी यहाँ 'अजनकत्व' शब्द से फलोपधायकतारूप जनकत्वाभाव विवक्षित होने से वह तो उसमें नहीं ही है। ७०