खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ५५६ भवदन्यत्वव्यक्तिभेदपर्यन्तगमनं प्रमाणस्य न सहते । यदि चान्यत्वव्यक्ति- भेदोऽपि स्यात्तथापि प्रसङ्गमूलभूता व्याप्तिः सामान्याकारपुरस्कारित्वात् एतेनैवो- पधीयमानानामन्यत्वव्यक्तीनामैक्यमादाय प्रवृत्ता तथैव प्रसङ्गे विपर्यये चोपनयन्ती स्यादेवोक्तदोषालङ्घनायेति । एवं प्रकारता चाऽऽश्रयाश्रयिभाववत् प्रकारान्तराश्रयेष्वपि आत्माश्रयोदाहरणे- ष्वतिदिश्यते । अन्योन्याश्रयो यथा—भेदेनावगताद्भेदज्ञानोपगमे, सोऽपि त्वया कथङ्कार- ऐसा कहा जा सकता, यदि प्रतियोगी भेद से अन्यत्व का भेद होता । किन्तु अन्यत्व का भेद है नहीं, कारण आकाश की तरह अन्यत्व एक होने पर भी घट-पटप्रति- योगिरूप उपाधियों के भिन्न होने से घटाकाश, मठाकाश की तरह 'घटो न, मठो न' इत्यादि प्रतीतियों के भेदों की उपपत्ति हो सकती है। फिर प्रतियोगी भेद से अन्यत्व का भेद क्यों माना जाय ? यदि किसी प्रकार अन्यत्वव्यक्ति का भेद मान भी लें, तब भी उपलक्षण-कल्प में निर्वाह नहीं हो सकता । कारण उक्त प्रसङ्ग का मूल (कारण) व्याप्ति सामान्यरूप से प्रवृत्त होती है । एवञ्च वह एतत्त्व से उपलक्षित अनन्त अन्यत्व-व्यक्तियों के ऐक्य का ग्रहण करके ही होगी । अतः वह एतत्त्व से उपलक्षित अन्यत्वरूप से प्रसङ्ग तथा विपर्यय में प्राप्त होगी । तथाच उक्त दोष का लंघन (निवारण) नहीं हो सकता । अर्थात् पट का अन्यत्व घट मे रहने से उक्त प्रसङ्ग हो ही नहीं सकता । इसी प्रकार 'स्वस्मात् स्वं जायते' इत्यादि आत्माश्रय-प्रकारों में भी दोष जानने चाहिए । कारण वहां भी 'स्व यदि स्व से उत्पन्न हो, तो स्व से अन्य हो जायगा' ऐसा ही आपादन-आकार होने से व्याघात और विपर्यय में अपर्यवसान स्पष्ट है । आत्माश्रय की तरह अन्योन्याश्रय भी तात्त्विक नहीं । कारण तार्किक अन्योन्याभाव वहीं मानते हैं, जहां [अभाव भाव का प्रतियोगी रूप होने तथा प्रतियोगी से अनालिङ्गित अभाव की प्रतीति न होने से ] भेदज्ञानजन्य प्रतियोगिज्ञान से भेद का ज्ञान और प्रतियोगिज्ञानजन्य भेदज्ञान से प्रतियोगी का ज्ञान माना जाता है । किन्तु आप उसका उपन्यास कैसे करेंगे ? 'यदि भेद, भेदज्ञान के अधीन जो प्रतियोगिज्ञान, उसके अधीन ज्ञान का विषय होता, तो ज्ञान का विषय न होता' इस प्रकार आपादन तो हो नहीं सकता । कारण प्रतियोगिज्ञानाधीन ज्ञान का विषय भेद अन्यत्र