खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 582, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें५६० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ मुपन्यसनीयः ? न तावत् 'यद्येतत् एतद्बोधाधीनबोधं स्यात्तदा न बुद्धयेते'ति । तथा सति व्याप्त्यसिद्धेः, एतद्बोधाधीनबोधं यत्तद्बोधाधीनबोधस्य तस्यैवा- दृष्टचरत्वात् । कयाचन व्याप्यव्यापकभेदकल्पनया व्यभिचाराप्रतीतचरत्वयोर्वारणेऽपि अतथाभावशङ्काखण्डकदण्डदुर्लभत्वात् । एवमन्योन्याश्रयान्तरेऽपि । चक्रकं च मध्ये परन्तर्भाव्य आत्माश्रयान्योन्याश्रयावेव विपरिणमत इति तद्दोषं नातिक्रामति । व्याघातस्तु यथा—सन्नास्तीत्यत्र । तमपि कथं प्रयोक्ष्यसे ? यदि 'यद्ययं सन् स्यात्तदानीमसन्न स्यादि'ति ; तर्हि 'असन्न स्यादि'त्यस्यापि 'सन् स्यादित्य'- स्मिन्नेवार्थे पर्यवसानादभेदेन व्याप्यव्यापकभावस्यैवासिद्ध्यापत्तिः । दृष्ट है या नहीं ? यदि दृष्ट है तो 'न बुद्ध्येते' इस आपाद्य ( व्यापक ) के वहाँ न होने से व्यभिचार है । यदि दृष्ट नहीं है, तो धर्मी के अज्ञान से आपाद्य ( ज्ञानावि- षयत्व ) तथा आपादक ( भेदज्ञानाधीन जो प्रतियोगिज्ञान, तदधीन ज्ञानविषयत्व ) दोनों का सामानाधिकरण्य न होने से व्याप्ति का ग्रहण ( ज्ञान ) ही नहीं होगा । एवञ्च शिथिल-मूल होने से वह तर्क नहीं, तर्काभास हो जायगा । समर्थन—'जो वस्तु होती है, वह परस्पराधीनसिद्धिक नहीं होती; जैसे—घट- द्वय' इस प्रकार हम सामान्यमुखी व्याप्ति मानते ही हैं । एवञ्च विशेषरूप से भेद की अज्ञानदशा में भी व्याप्ति का ग्रह हो ही जायगा और व्यभिचार भी नहीं होगा । खंडन —आपादन का यह प्रकार भी युक्त नहीं । कारण ॰ 'वस्तुत्व रहे और परस्पराधीनबोधत्व का अभाव न रहे, तो क्या हानि है' इस प्रकार व्यभिचार-शङ्का होने पर उसका निवर्तक अनुकूलतर्क नहीं है । इसी प्रकार अन्यान्य अन्योन्याश्रयों में भी दोष जानने चाहिए । मध्य में अन्य को देकर आत्माश्रय तथा अन्योन्याश्रय ही चक्रकरूप में परिणत होता है । अतः चक्रक भी उन दोनों के दोषों का उल्लंघन नहीं कर सकता । तथान वह भी तर्क नहीं, तर्काभास ही है । व्याघात भी 'सन् नास्ति' इस स्थल में तार्किक बतलाते हैं । किन्तु उसका भी आपादन कैसे होगा ? 'यदि यह सत् है तो असत् नहीं है' इस प्रकार आपादन तो हो नहीं सकता । कारण 'असत् न' इसका भी फलितार्थ 'सत्' ही है और अभेद