खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 583, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] तर्क-विशेष-लक्षणों का खण्डन ५६१ स्वभावविरुद्धोपजीविनी च विरुद्धान्तरे तद्व्याघातनिरासादेव निरस्तप्राये । 'गौर्महिषः ततो न भवति, अगवात्मतानियता यतो महिषात्मता' इति, एष हि तयोर्विरोधः । अनवस्था तु यथा—सत्तायामपि सत्तान्तरमित्यनवधौ सत्ताप्रवाहे इष्य- माणे । तत्र कथं प्रत्यवस्थेयम् ? न तावत् 'यदि सत्तायां सत्ता स्यात्तदा न विश्रान्तिः स्यादि'ति ; सत्तायां सत्ताभ्युपगमस्य विश्रान्त्यभावेन सह व्याप्तिसिद्धय- सिद्धयोर्दोषग्रस्तत्वात् प्रतिबन्दी च खण्डितैव । किञ्च—प्रमेयत्वाभिधेयत्वव्यवहार्यत्वसन्निकर्षवत्त्वाभावप्रतियोगित्वादीना- मात्माश्रितत्वदर्शनात् कथमात्माश्रयताखण्डिका व्याप्तिः सव्यभिचारा न स्यात् । में व्याप्य-व्यापकभाव या उद्देश्य-विधेयभाव नहीं होता । एवञ्च शिथिल-मूल होने से व्याघात भी तर्क नहीं, तर्काभास है । स्वभाव से ही विरुद्ध सत् और असत् का उपजीवन करनेवाले अन्य विरुद्ध तो सत्-असत् के व्याघात के खण्डन से ही खण्डितप्राय हैं । जैसे—'गौर्महिषः' यह व्याघात भी इसी रीति से प्रवृत्त होता है कि 'यतः अगवात्मता से नियत महिषात्मता है, अतः गौ महिष नहीं है।' एवञ्च—'गौर्महिषः' इस व्याघात का भी 'अमहिषः महिषः' इस सत्-असत् के व्याघात में ही पर्यवसान जानना चाहिए । सत्ता में सत्ता का निरवधि प्रवाह माना जाय, तो अनवस्था हो जाती है । किन्तु उसमें भी अनिष्ट का आपादन कैसे होगा ? 'यदि सत्ता में सत्ता हो, तो कहीं विश्रान्ति नहीं होगी' इस प्रकार आपादन तो हो नहीं सकता । कारण यदि सत्ता में सत्ता के अभ्यु- पगमरूप आपादक और विश्रान्तिरूप आपाद्य की व्याप्ति को प्रमित मानें, तो प्रमित होने से ही वह अनवस्था दोष नहीं है । यदि वह अप्रमित है, तो प्रमाण न होने से उसका आपादन ही नहीं होगा । प्रतिबन्दी का खण्डन द्वितीय परिच्छेद में निग्रहस्थान-खण्डन के प्रसंग में ही हो चुका है । किञ्च—प्रमेयत्व अभिधेयत्व ( वाच्यत्व ), व्यवहार्यत्व, सन्निकर्षवत्त्व, भेदप्रतियो- गित्व आदि धर्म आत्माश्रित देखे जाते हैं । फिर आत्माश्रय का खण्डन करनेवाली व्याप्ति में व्यभिचार क्यों न हो ? ७१