खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८० सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ उपसंहारः ग्रन्थग्रन्थिरिह क्वचित्क्वचिदपि न्यासि प्रयत्नान्मया, प्राज्ञम्मन्यमना हठेन पठिती माऽस्मिन् खलः खेलतु । श्रद्धाराद्धगुरुश्लथीकृतदृढग्रन्थिः समासाद्यत्, त्वेतत्तर्करसोर्मिमज्जनसुखेष्वासञ्जनं सज्जनः ॥ ताम्बूलद्वयमासनं च लभते यः कान्यकुब्जेश्वरात् यः साक्षात्कुरुते समाधिषु परब्रह्मप्रमोदार्णवम् ॥ उपसंहार इस ग्रन्थ में कहीं-कहीं यत्नपूर्वक रचना का काठिन्य हमने इसी प्रयोजन से किया है कि जो प्राज्ञम्मन्य हैं, वस्तुतः प्राज्ञ नहीं हैं तथा हठ से पढ़नेवाले हैं, वे खल- जन इस ग्रन्थ में क्रीड़ा न करें । किन्तु श्रद्धा से आराधित गुरुओं द्वारा जिन्होंने ग्रन्थ-काठिन्य विघटित कर दिया, ऐसे सज्जन विद्वान् ही मदुक्त तर्क की रस-ऊर्मी में मज्जन-सुख से प्रेम का लाभ करें । कान्यकुब्ज देश के महाराज से जिन्हें दो बीड़े पान तथा उच्च आसन प्राप्त होता है, जो समाधि में आनन्द ब्रह्म का साक्षात्कार करते हैं तथा जिनका काव्य मधु- १. शंका हो कि समाधि द्वारा ब्रह्मसाक्षात्कार होने पर तो उस व्यक्ति सारा कर्तव्य ही समाप्त हो जाता है । फिर वह ग्रन्थ-रचना कैसे करेगा ? तो यह ठीक नहीं । समाधि में ब्रह्म का साक्षात्कार करनेवाला भले ही उस समय ग्रन्थ न रच पाये, किन्तु बाद में तो रच ही सकता है । ब्रह्मसाक्षात्कारी कुछ करता ही नहीं, ऐसा भी नहीं कह सकते । कारण जीवन्मुक्त लोग देवता और गुरु का आराधन करते पाये ही जाते हैं । आहार्य भेदज्ञान करके वे जैसा उन कामों को करते हैं, वैसे ही ग्रन्थ-रचना भी करें, तो कोई बाधा नहीं है । इसी तरह यह भी नहीं कहा जा सकता कि ब्रह्मसाक्षात्कार या अद्वैत-भावना के कारण श्रवण, मनन-निदिध्यासन आदि का चतुर्थाश्रमी (संन्यासी) को ही अधिकार है; श्रीहर्ष जैसे गृहस्थ यह नहीं कर सकते । कारण श्रवणादि के बिना गुरु और देवता के प्रसाद से भी मानव को अद्वैत-भावना हो सकती है । इसीलिए 'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः...’, ‘शृण्वन्तोऽपि बहवो यन्न विदुः’ इत्यादि श्रुतियाँ स्वरसतः संगत होती हैं । 'ईश्वरानुग्रहादेव पुंसामद्वैत- वासना' आदि वचन भी स्पष्ट यही कहते हैं । चतुर्थाश्रम का साफल्य तो विशेष रूप से निवृत्ति- प्रियों के लिए ही हो सकता है । अतः उसका भी वैफल्य नहीं होगा ।