भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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परिच्छेद ] सर्वखण्डन-प्रकार का उपदेश ५७६ ध्यात् । तत्र खण्डनवादिनः प्रस्तुता प्रतिक्रिया न स्फुरेत् , तदाऽपरेण प्रयुज्यमाने वाक्ये बहुपदात्मके कस्यचित्पदस्यार्थं खण्डनान्तरमवतारणीयम् । एवं तत्रापि परेण प्रज्ञाशोषणे पुनस्तथैव शाखान्तरेषु सङ्क्रमणीयमिति प्रकारेण खण्डनमये चक्रे सम्यगवधेयम् । न च शाखान्तरसङ्क्रान्तावर्थान्तरं पतेत्; अप्रकृतत्वाभावात् । न चैकनि- र्णयारम्भे अन्यसङ्क्रान्तावनौचित्यं स्यात्; 'शब्दोऽनित्यः कृतकत्वादि'त्यादौ परेणोक्ते कृतकत्वादौ विप्रतिपत्तव्यत्वापत्तेरन्यतरासिद्ध्याद्युच्छेदापातात् । येन हि तन्निर्वाह्यते, तदनिर्वचनीयतयाऽपि निर्वाह्याऽनिर्वचनीयतैवेति । तस्मात्— 'तत्तुल्योहस्तदीयं च योजनं विषयान्तरे । शृङ्खला तस्य शेषे च त्रिधा भ्रमति मत्क्रिया ॥' प्रयुक्त बहुपदात्मक वाक्य में किसी पद के अर्थ का खण्डन करने के लिए खण्डनान्तर का अवतरण करना चाहिए । इसी प्रकार यदि वहां भी वादी प्रज्ञा का शोषण ( निष्प्रभ ) कर दे, तो पुनः उक्त प्रकार से अन्य शाखा का अवलम्बन करना चाहिए । अन्य शाखा के अवलम्बन से अर्थान्तर भी नहीं होगा; कारण वह ( अन्य शाखा ) भी प्रस्तुत ही है और 'अप्रस्तुत अन्य अर्थ का अवलम्बन' ही 'अर्थान्तर' होता है । इसी प्रकार एक पदार्थ के निर्णय के आरम्भ में अन्य पदार्थ के संक्रमण से होनेवाला अनौचित्य भी यहां नहीं होगा; कारण अनौचित्य भी अप्रस्तुत अन्य के अवलम्बन में ही होता है । अन्यथा यदि प्रस्तुत विषय में भी अर्थान्तर या अनौचित्य हो, तो शब्द में कृतकत्व से अनित्यत्व-साधन के प्रस्ताव में अर्थान्तर के भय से कृतकत्व में भी विप्रतिपत्ति ( जिज्ञासा ) नहीं होगी । साथ ही अन्यतरासिद्धि-स्थल का भी उच्छेद हो जायगा । कारण अन्यतर के प्रति ' हेतु के असिद्धिस्थल में यदि हेतु की सिद्धि करें तो अर्थान्तर या अनौचित्य हो जायगा । फलतः साध्य के साधन के प्रस्ताव में हेतु का साधन कोई नहीं करेगा । किन्तु वस्तुतः हेतु का निरूपण प्रस्तुत ही है; कारण जिस हेतु से जो निरूपित होता है, उस हेतु के अनिर्वचनीयत्व से साध्य का अनिर्व- चनीय सिद्ध होता है । तस्मात् मदुक्त्युक्ति के तुल्य अन्य युक्तियों की ऊहा, अन्यत्र उक्त मदुक्त युक्तियों का अन्यत्र योजन तथा उन युक्तियों का खण्डन होने पर शृङ्खला-शाखान्तरारोहण—इस प्रकार वाद में मेरी खण्डन-प्रक्रिया तीन प्रकार से चक्कर काटती रहती है ।