भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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५७८ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ बाधविरुद्धत्वव्यभिचारास्तु अनुमानवत् तर्केऽपि दोषाः पृथग्वाच्याः । बाध उत्सर्गसम्भावनादेरन्यत्रानुकूलः । तर्कस्य सप्तममपि दोषं तर्कस्याऽऽपत्तिसाम्यं न नामोपगच्छामः , स चोभा- भ्यामभ्युपगतव्याप्येनानभ्युपगतव्यापकेन प्रागेव दर्शित इत्यास्तां विस्तर इति । सर्वखण्डन-प्रकारोपदेशः एवं प्रकाराणि तत्तल्लक्षणेषु खण्डनान्यूहनीयानि । तदेतासु खण्डनयुक्तिषु कामपि स्थानान्तरस्थां केनापि प्रकारान्तरेणाऽऽनीय तत्सदृशीमन्यादृशीं वा स्वयमूहयित्वा परैर्विविच्यमानानि पदार्थान्तराण्यपि बुद्धिमता बाधनीयानि । अत्र चास्माभिर्दूषयितुं शङ्कितेभ्यः परपक्षप्रकारेभ्यो यदि प्रकारान्तरं कोऽपि स्वयमूहति, उक्तानां बाधकानां मध्ये क्वचित्प्रज्ञयाऽपि समाधानमभिद- इतना ही नहीं बाध, विरोध और व्यभिचार अनुमान की तरह तर्क में भी पृथक् ही दोष हैं । उत्सर्ग तथा सम्भावनारूप तर्क से भी अन्य तर्कों में बाध अनुकूल है, अर्थात् आभासत्व का प्रयोजक नहीं है । कुछ लोग तर्क में 'आपत्तिसाम्य'रूप सप्तम दोष भी मानते हैं। यह आपत्तिसाम्य वहाँ होता है, जहाँ दोनों पक्षों ने व्याप्य का स्वीकार किया हो और व्यापक का स्वीकार न किया हो । किन्तु इस दोष को 'यदि सत्ता सद्द्व्यवहारविषय हो, तो सत्तावती हो जायगी' इस स्थल में तर्क-खण्डन के प्रस्ताव में 'यत्रोभयोः समो दोषः' इत्यादि से हम पहले ही दिखा चुके हैं, अतः विस्तार व्यर्थ है । सर्व-खण्डन-प्रकार का उपदेश हमने विस्तार-भय से जिन लक्षणों का खण्डन नहीं किया है, उन लक्षणों में भी अस्मदुक्त खण्डन के सदृश खण्डनों की स्वयं ऊहा कर या इन्हीं खण्डन-युक्तियों के बीच अन्य स्थानस्थित किसी खण्डनयुक्ति का किसी प्रकार आनयन कर या तत्सदृश युक्तियों की ऊहा कर वादी द्वारा विवेचित अन्यान्य पदार्थों के लक्षणों का भी बुद्धि- मान् खण्डन करें । इस ग्रंथ में हमने जिन लक्षणों का खण्डन किया है, यदि वादी उनके तुल्य अन्य लक्षणों की ऊहा करे या उक्त बाधकों के बीच अपनी प्रज्ञा के बल किसीका समा- धान भी कर दे और खण्डनवादी को प्रस्तुत समाधान की स्फूर्ति न हो, तो वादी द्वारा