भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 599

अप्रसंगात्मक तर्क का निरूपण ५७७

नोपपद्यते । व्याप्तिपक्षधर्मतयोः प्रतीतिमपेक्ष्य यथाऽनुमानं जायते तथैव तर्कोऽपि । इयान् परमनयोर्विशेषो यदनुमानं तयोः प्रमित्या जायते, तर्कस्त्व- वास्तवाभ्यामपि ताभ्यां पराभ्युपगममात्रसिद्धाभ्यां भवति । तेन विमृष्यमाणः तर्कः पराभ्युपगममात्रप्रसादसिद्धपरिकरो नाऽऽश्रयासिद्धिमपि तावद्वास्तवीमनु- रोद्धुमधिकरोति । ततः प्रमित्यभ्युपगमसिद्धिकृतवैचित्र्याश्रयाङ्गे'दादन्यो यावान् यथा च हेत्वाभासविभागः, तद्वदेव च तर्काभासविभागोऽपि न्याय्यः । तस्मादाश्रयासिद्धिमूलशैथिल्येष्टापादनानि असिद्धिरेकैव दोषोऽनुमानवत् । तत्र अप्रमितत्वावलम्बिनी, इह त्वनभ्युपगमावलम्बिनीति विशेषः । मिथोविरोधश्च सत्प्रतिपक्षतैव । विपर्ययापर्यवसानं तु दोष एवाऽऽपादनस्य न भवति । यन्नाम विपर्ययापर्यवसानादापादनमात्मसाधनानुकूलं न भवति, तदन्यदेव किमपि । नहीं है । कारण व्याप्तिपक्षधर्मता की प्रतीति के बल पर जैसे अनुमिति होती है, वैसे ही तर्क भी होता है । किन्तु दोनों में भेद यह है कि अनुमिति तो 'व्याप्ति-पक्षधर्मता की प्रमिति' के बल पर से होती है और तर्क अवास्तव, किन्तु 'पर के अभ्युपगम- मात्र से सिद्ध व्याप्ति-पक्षधर्मता' से भी होता है । इस प्रकार विचारने पर तर्क पर के अभ्युपगममात्ररूप प्रसाद से सिद्ध सामग्रीवाला है । अतः वह वास्तविक आश्रयासिद्धि को भी रोक नहीं सकता । तस्मात् प्रमिति और अभ्युपगम की सिद्धि के वैचित्र्य- मूलक भेदों को छोड़ जितने और जिस प्रकार के हेत्वाभास के विभाग अनुमान में होते हैं, तर्क में भी उतने ही और उसी प्रकार के तर्काभास-विभाग जानने चाहिए । तस्मात् आश्रयासिद्धि, मूलशैथिल्य, इष्टापादन ये तीनों तर्कदोष असिद्धिरूप एक ही दोष के अन्तर्गत है, जैसा कि अनुमान में होता है । दोनों में अन्तर इतना ही है कि वह असिद्धि 'अप्रमितत्व' का अवलम्बन करती है, तो तर्क में 'अभ्युपगम' मात्र का । इसी तरह मिथोविरोध सत्प्रतिपक्ष ही है । फिर, विपर्ययापर्यवसान तो तर्क का दोष ही नहीं है । जो आपादन, विपर्यय में पर्यवसान न होने से, आत्मसाधन के अनुकूल नहीं होते वे और ही कुछ दोष हैं । अर्थात् जहां पर-पक्ष में दोषमात्र देना हो वहाँ विपर्ययापर्यवसित तर्क का भी उपयोग होने से विपर्ययापर्यवसान को तर्काभास तो मान ही नहीं सकते । फिर जहां स्वपक्ष-साधनार्थ विपर्ययापर्यवसित तर्क का उपन्यास नहीं होता, वहाँ उसका कारण कुछ और ही दोष हैं, कथित तर्काभास नहीं ।