खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 598, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ें५७६ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ न च कश्चिदुक्तप्रकारमन्यथाख्यातिसमाधानं नानुमन्तुं शक्नोति । अन्यथा कथमसत्ख्यातिवादिनो मतमपि जानीयात्, अज्ञात्वा च स्वपरमत- वैचित्र्यं वादे प्रवर्तेत । एते सर्वेऽपि तर्काः प्रमाणविरोधे वा प्रमाणाभावे वा निष्पीडिताः प्रविशन्तो न बाधासिद्धिभ्यां भिद्यन्ते । पूर्वैरपि लोकसिद्धत्वात् व्यवहृताः । केवलमस्माभिरेव तर्कपदव्यामभिषिक्ताः, ततो न प्रबन्धेन निरस्यन्ते - 'विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं च्छेत्तुमसाम्प्रतम्' इति । तर्काभास-खण्डनम् ये च परैस्तर्कदोषाः षट् स्वीक्रियन्ते—आश्रयासिद्धिः, अनुकूलत्वम्, मूलशैथि- ल्यम्, इष्टापादनम्, विपर्ययापर्यवसानम्, मिथोविरोधश्चेति; सोऽयं तर्कस्य दोषविभागो 'असत् भी सत् से उपश्लिष्ट ही भासता है, केवल असत् नहीं भासता और यही अन्यथाख्याति है'— कोई भी अन्यथाख्यातिवादी इस प्रकार उक्त अन्यथाख्याति के निर्वाह का अस्वीकार नहीं कर सकता । यदि अस्वीकार करे, तो असत्ख्यातिवादी के मत को कैसे जानेगा ? कारण वह असत् का भान तो मानता नहीं । मेरे कथन के अनुसार तो सत् जो ख्याति, उससे उपश्लिष्ट असत् का भान होता है, अतः असत्- ख्यातिवादी का मत जानने में उसे कोई बाधक नहीं है । स्व और परमत का वैलक्षण्य बिना जाने कोई भी पुरुष वाद में प्रवृत्त ही कैसे हो सकेगा ? विचार करने पर यदि अविनिगम आदि चार तर्क प्रमाण के विरोधरूप हों, तो बाध में और यदि प्रमाण के अभावरूप हों, तो असिद्धि में अन्तर्भूत हो जाते हैं, इनसे पृथक् नहीं हैं। पूर्वाचार्यों ने भी इन तर्कों को लोकसिद्ध माना है। मैंने ही केवल इन्हें तर्क-पदवी पर आरूढ़ किया है। इसीलिए हम अतियत्न से इनका खण्डन नहीं करते। कारण विष का वृक्ष भी स्वयं बढ़ाकर स्वयं छेदन के अयोग्य होता है, ऐसा वृद्धजन कहते हैं। अर्थात् बाध और असिद्धि से पृथक् पूर्वोक्त अविनिगम आदि तर्कों की सत्ता ही नहीं है और उन दोनों का खण्डन हो ही चुका है। अतः इनका खण्डन व्यर्थ है, यह भाव है। तर्काभासों का खण्डन आश्रयासिद्धि, अनुकूलत्व, मूलशैथिल्य, इष्टापादन, विपर्ययापर्यवसान और मिथो- विरोध तर्क के ये पांच अन्य दोष भी आचार्यों ने माने हैं। यह दोषविभाग भी ठीक