खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)
Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष द्वारा
पृष्ठ 597, कुल 610 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरिच्छेद ] अप्रसंगात्मक तर्क का निरूपण ५७५ ननु सर्वथैवासत्ख्यातिरपि भवताऽनुमन्तव्यैव । तथाहि-'वन्ध्यासुत-शशविषाणे कूर्मरोमैवे'ति वदतः शब्दादर्थं प्रतिपादयतां किं तदणुमात्रमपि समुल्लेख्यं तत्प्र- तीतेरिति चेन्न । तत्रापि तादात्म्यस्य सामान्यतोऽन्यत्र प्रतीतस्यैव असदुपहितस्य स्फुरणोपगमात् । प्रकारभेदवैशिष्ट्येन भिन्नयोरेकत्वं हि तादात्म्यम्, तच्चाऽन्य- त्रास्त्येव । तर्कसंशयाभ्यामप्रमाभ्यां जननेऽपि तत्तत्प्रमावत् मध्यस्थाद्यप्रमया तथा प्रश्नानौचित्यादिप्रमोत्पादनाविरोधः । बाधवद्भ्रमविषयातथाभावेऽपि भ्रमस्या- अप्रमात्वपारमार्थिकतावत् प्रश्नविषयासत्यत्वेऽपि प्रश्नानौचित्यसत्यतोपपत्तिरेव । एतेन भ्रान्तिजाया धियः प्रमात्वं तथाप्यदृष्टचरमित्यपि परास्तप्रायमिति । एवमन्यत्राप्येवंविधोदाहरणे वाच्यम् । प्रश्न—आपको सर्वथा असत्ख्याति भी अवश्य माननी होगी। देखिये—'वन्ध्या- सुत और शशविषाण कूर्मरोम ही हैं' इस शब्द का क्या अणुमात्र भी अर्थ है, जो उक्त प्रतीति का विषय हो ? उत्तर—सामान्यरूप से अन्यत्र प्रतीत ही असत् से उपहित तादात्म्य इस प्रतीति का विषय होता है। कारण प्रकार-भेद से विशिष्ट विभिन्न अर्थों का ऐक्य 'तादात्म्य' पदार्थ है और वह अन्यत्र सत् ही है। किंच—तर्क तथा संशय स्वयं तो अप्रमाण हैं, फिर भी जैसे उनसे प्रमात्मक अनुमिति होती है, वैसे ही मध्यस्थ के अनौचित्यरूप विषय को विषय करनेवाली अप्रमा से भी प्रश्नानौचित्यविषयक प्रमा उत्पन्न हो ही सकती है। अथवा बाधित भ्रम का विषय भी असत् ही होता है, फिर भी उक्त भ्रम अपने में अप्रमात्व की पारमार्थिकता ( प्रमा ) का जनक होता ही है। इसी तरह 'शशशृङ्गमृजु वक्रं वा ?' इस प्रश्न का विषय असत् होने पर भी प्रश्नानौचित्य में सत्यत्व का अवगाहन करनेवाली प्रमा हो ही सकता है। इसीसे 'भ्रान्ति से जायमान बुद्धि में प्रमात्व कहीं नहीं देखा गया है' यह कथन भी खंडितप्राय है। कारण पीछे अनेक उदाहरणों द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया जा चुका है कि भ्रान्तिज बुद्धि से भी प्रमा होती है। इसी प्रकार वन्ध्यासुत, गगनारविन्द, कूर्मरोम आदि असत्ख्यातियों में सत् से उपश्लिष्ट ही असत् का भान मानना चाहिए।