भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 596

५७४ सानुवाद खण्डनखण्डखाद्य [ चतुर्थ यद्वस्तुतः तदसदाश्रयः प्रतियोगी च तस्येत्यन्यथा कृत्वा प्रतीयत इत्यन्यथा- ख्यातिरेवोपगता भवति । यथा तु विशिष्टमत्यन्तासदेव तथाऽऽश्रयप्रतियोगिनी अत्यन्तासती एव किं न प्रतिभासेते ? तावताऽपि यथोक्तान्यथाख्यात्यनुलङ्घनादेव । न चैवमसत्ख्यातिवादिनाऽपि शक्यं वक्तुम् ; केवलं सदेव प्रकाशत इत्य- स्मात्पक्षाद्विपरीतं विशिष्टं सम्बन्धश्च क्वचिद्विशेषणाद्यपि अत्यन्तासद् भ्रान्त्योल्लि- ख्यत इत्येवंरूपा तावदसत्ख्यातिः परेणोपगतैव । यदि तु सदपि प्रकाशते किञ्चित्, तत्किं नासत्प्रकाशत इति । यतः परेण विकल्पः सर्वथा वस्त्वनुल्लेखी केवलमलीकमुल्लिखन् असत्ख्यात्यात्मा स्वीक्रियते । यदि तु यथोक्तमेव परोऽप्यभ्युपगच्छति; तदानीमनुमानप्रमाणादिवत् अत्राप्यविप्रतिपत्तिरेवेति । शशविषाण भिन्न है' इस स्थल में भी सामान्यतः अन्यत्र दृष्ट ही भेद प्रतीति का विषय होता है । अन्तर केवल यह है कि अन्यत्र भेद का सत् आश्रय और प्रतियोगी भासता है और प्रकृत में अन्यथा रूप से भेद का असत् प्रतियोगी और असत् आश्रय भासता है । फिर यहाँ भी अन्यथाख्याति ही क्यों न मानी जायगी ? जैसे विशिष्ट अत्यन्त असत् ही भासता है, वैसे ही उक्त प्रतीति में आश्रय आश्रय और प्रतियोगी अत्यन्त असत् ही भासते हैं, ऐसा मानने पर भी अन्यथाख्याति का उल्लंघन नहीं है । प्रश्न—असत्ख्यातिवादी भी कह सकता है कि "जैसे 'केवल सत् ही भासता है' इस पक्ष से विपरीत विशिष्ट, सम्बन्ध और कहीं-कहीं विशेषण भी अत्यन्त असत् ही भासते हैं, ऐसी असत्ख्याति को अन्यथाख्यातिवादी मानते हैं, वैसे ही असत् भी 'सत् से उपश्लिष्ट ही भासता है, केवल नहीं भासता । अतः सर्वज्ञान असत्ख्याति ही है।" उत्तर—बौद्ध सद्वस्तु की अनवगाहिनी केवल उल्लेख करनेवाली विकल्परूप असत्ख्याति मानते हैं और अन्यथाख्यातिवादी सत्-उपश्लिष्ट ही असत् भासता है, ऐसा मानते हैं । दोनों मतों में यह महान् भेद है । यदि कहें कि 'बौद्ध भी सत् से उपश्लिष्ट ही असत् के भान को असत्ख्याति मान लेंगे। अर्थात् जैसे किञ्चित् सत् के भासने पर भी वे अन्यथाख्याति मान लेते हैं, वैसे ही किञ्चित् असत्के भासने पर असत्ख्याति भी क्यों न मानी जाय ?', तो यह भी ठीक नहीं। कारण अनुमान के प्रामाण्य के तुल्य उक्तस्वरूप असत्ख्याति मानने में हमें तो कोई विप्रतिपत्ति नहीं होगी, किन्तु आप बौद्धों के लिए यह अपसिद्धान्त हो जायगा ।