भारतकोश
खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

खण्डनखण्डखाद्यम् (महाकवि श्रीहर्ष - अद्वैत न्याय-खण्डन एवं तत्त्व-निर्णय सटीक)

Khandanakhandakhadya of Mahakavi Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष द्वारा

DevanagariHindipublished610 पृष्ठ

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पृष्ठ 595

त्वात् । तस्मात् मध्यस्थं प्रत्यनुत्तरदाने स्वदोषपरिहाराय प्रतिवादिनाऽपि वैयात्य- लक्षणदर्शनं कार्यम्, मध्यस्थं प्रति तस्याप्रमाणेनापि प्रतिबोधने निर्दोषत्वात् । ननु वादिभ्यामेव वा, वादिनि मध्यस्थेन वा, तं प्रति वादिना वाऽत्यन्ता- सद्धिषये व्यवहारोपगमे कथं नासत्ख्यातिः स्वीकृता स्यात् ? किं न स्यात् । विशिष्टरूपे सम्बन्धांशे चासत्ख्यातेरन्यथाख्यातिवादिभिरप्यभ्युपगमात् । ननु 'वन्ध्यासुताच्छशविषाणं भिन्नम्'त्यादिषु व्यवहरतः कथं विशेष्ये विशेषणेऽपि नासत्ख्यातिरूपगन्तव्येति चेत् । न ; असत्ख्यात्यभ्युपगमस्य सत्ख्यातित्वात्यागनियमोपगमविश्रान्तत्वात् । असदपि सदुपश्लिष्टमेव प्रतिभासते, न तु केवलमसत् कयाऽपि ख्यात्या समुल्लिख्यते इत्यन्यथाख्यातिवादिभिरिष्य- माणत्वात् । वन्ध्यासुताच्छशविषाणं भिन्नमिति प्रतिपत्राऽपि भिन्नमित्ययमंशः सामान्यतोऽन्यत्र दृष्ट एव प्रतीयते । केवलं भेदस्य सदाश्रयः प्रतियोगी चेति प्रयोजक होते हैं ) वादी का प्रबोधन करता है, वैसे ही अप्रमाण का अवलम्बन करके भी वादी का प्रबोधन करे तो क्या हानि है ? कारण मध्यस्थ वादी के प्रति अनौचित्य का प्रबोधन भ्रान्ति से ही कर सकता है, उसके लिए अभ्रान्तता से व्यवहार्यता का नियम नहीं है । तस्मात् मध्यस्थ के प्रति प्रतिवादी भी उत्तर न देने के अपने दोष ( अप्रतिभा ) के परिहारार्थ अनौचित्य का बोध करा ही सकता है । कारण मध्यस्थ के प्रति अप्रमाण से भी प्रतिबोधन में उसे कोई दोष नहीं है । एवञ्च वादी के नियोग के बिना मध्यस्थ भी उसके अनौचित्य का उद्भावन कैसे करेगा, यह शंका भी नहीं रहती । प्रश्न—अत्यन्त असत् वादी के प्रति वादी के, वादी के प्रति मध्यस्थ के या मध्यस्थ के प्रति वादी के को व्यवहार का विषय मान लेने पर तो असत्ख्याति का स्वीकार हो जायगा । उत्तर—अन्यथाख्यातिवादी विशिष्ट अंश या सम्बन्ध-अंश में जैसे असत्ख्याति मानते हैं, वैसे ही अनौचित्य के विषय में भी असत्ख्याति मानें, तो हानि क्या है ? प्रश्न—'वन्ध्या-सुत से शश-विषाण भिन्न है' इस स्थल में विशेष्य-विशेषण अंश में भी असत्ख्याति क्यों न मानी जाय ? उत्तर—असत्ख्याति के अस्वीकार का अर्थ है, सत्ख्याति का अत्याग । सर्वथा असत्ख्याति को न मानना उसका अर्थ नहीं है, कारण असत् भी सत् से उपश्लिष्ट ही भासता है, केवल असत् किसी ख्याति से नहीं भासता । यही तो अन्यथाख्यातिवादी भी मानते हैं । 'वन्ध्या-सुत से